Showing posts with label हाल-चाल. Show all posts
Showing posts with label हाल-चाल. Show all posts

Wednesday, March 21, 2018

नोटबंदी के बाद मार्केट में कहां से आया इतना कैश?

8 नवंबर 2016 की रात को अचानक मोदी जी के मन में नोटबंदी का लड्डू कैसे और क्यों फूटा, सही-सही तो वही बता सकते हैं, लेकिन उन्होंने हमें जो नोटबंदी का जो कालाधन टाइप का झूठ बताया था, उसकी पोलपट्टी खुलती जा रही है। वैसे भी, पोलपट्टी झूठ की ही खुलती है। शुक्र है मोदी जी धोती नहीं पहनते। बहरहाल, रिजर्व बैंक ऑफ मोदिया की ही रपट है कि अभी बाजार में जितना पैसा सर्कुलेशन में है, वह उन नंबर्स से कहीं ज्यादा है, जो नोटबंदी के पहले रिजर्व बैंक के पास थे। मतलब नोटबंदी के पहले मार्केट में जितना पैसा तैर रहा था, अब उससे कहीं ज्यादा तैर रहा है।

नोटबंदी के बाद नोटों का, हमारा, अर्थव्यवस्था का क्या हुआ और क्या होता जा रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। हम लाइनों में लगे, लाठी खाई, टांगें तुड़वाईं, गाली खाई, लड़े और लड़ने के बाद पता चला कि कालाधन तो सफेदधन कर लिया गया। वह भी बगैर कोई टैक्स चुकाए। अभी तक सरकार इसका एक्यूरेट आंकड़ा नहीं दे पाई है कि नोटबंदी के बाद कितना कालाधन उसने सफेद किया और सफेद करने के कितने पैसे लिए।

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि 8 नवंबर से पहले देश में 17.97 ट्रिलियन करेंसी फ्लो में थी। तब मोदी महान ने ताली पीट-पीटकर कहा था कि कालाधन वाले माथा पीट रहे हैं, और ताली बजा बजाकर करोड़ों लोगों को बेवकूफ बनाया था। अब आरबीआई बता रहा है कि 8 मार्च 2018 यानी इसी महीने बाजार में कैश सर्कुलेशन 18.13 ट्रिलियन रुपये हो चुका है। मजे की बात यह कि अभी खुद आरबीआई को नहीं पता कि इसमें उसने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और इनके लत्ते-गत्ते के कड़क नोट शामिल हैं या नहीं। वैसे अगर नरेंद्र मोदी के इन चाहने वालों के भी पैसे इसमें जोड़ दिए जाएं तो अमाउंट और भी बढ़ जाएगा।

अरे हां, नोटबंदी के पीछे मोदी महान ने एक और तर्क दिया था- डिजिटाइजेशन। आरबीआई की ही रिपोर्ट कहती है कि अक्टूबर 2017 से फरवरी 2018 तक के बीच में डेबिट-क्रेडिट कार्ड से होने वाले भुगतानों में मोदी महान जितनी ही गिरावट आ चुकी है। पिछले साल 28 अगस्त 2017 में आरबीआई ने ही बताया था कि नोटबंदी के बाद सिर्फ 1 फीसद नोट वापस नहीं आए, बाकी जितने छापे थे, सब वापस आ गए। मगर कालाधन? आया? पंद्रह लाख? आए? नौकरी? आई? हुंह। 

Thursday, March 8, 2018

महिलाओं के लिए मुश्किल

भारत में औरतें काम से बाहर हो रही हैं। देश की कार्यशक्ति का हिस्सा बनने वाली महिलाओं का प्रतिशत पिछले बारह वर्षों में सीधे दस फीसदी नीचे आ गया है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए यह खबर भयंकर बेचैनी पैदा करने वाली होती, लेकिन हमारे यहां तो इस पर बात भी नहीं हो रही है। वर्ल्ड बैंक के आंकड़े बता रहे हैं कि 2005 में 15 साल से ज्यादा उम्र की लगभग 36 फीसदी महिलाएं वेतन या मजदूरी के एवज में कहीं न कहीं काम कर रही थीं। लेकिन 2017 में ऐसी महिलाओं का हिस्सा सिमटकर 25.9 फीसदी पर आ गया। इसका असर देश की कुल श्रमशक्ति में कमी के रूप में देखा जा रहा है। सन 2016 में चीन का प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत का 2.4 गुना था, जबकि प्रति कामगार जीडीपी 1.7 गुना दर्ज किया गया। लेकिन तीन दशक पहले चीन उत्पादन से लेकर कमाई तक में भारत से पीछे था। उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से कम तो थी ही, प्रति कामगार जीडीपी भी भारत से कम थी। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक सन 1991 में इन दोनों ही मामलों में चीन का दर्जा भारत से नीचे था। लेकिन चीन की तेज तरक्की के पीछे तकनीकी बढ़त के अलावा खास बात यह देखी गई कि वहां की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी भारत से कहीं ज्यादा है। पिछले साल के आंकड़े के मुताबिक भारत की 25.9 प्रतिशत के मुकाबले चीन की 60.4 प्रतिशत महिलाएं बाहर निकलकर किसी कार्यस्थल पर अपनी सेवाएं दे रही थीं। मामले का दूसरा पहलू यह है कि कुल महिलाओं में कामकाजी महिलाओं का हिस्सा धीमी रफ्तार से ही सही, लेकिन पूरी दुनिया में गिर रहा है, पर इस गिरावट में जितनी तेजी भारत में दर्ज की गई है, उसकी कहीं और कल्पना भी करना मुश्किल है। इसकी वजहों पर जाएं तो हाल का नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे बताता है कि 15 से 19 वर्ष तक की 78.3 फीसद लड़कियों को हम घर से बाहर जाने ही नहीं देते, जबकि 20 से 24 साल की 30.8 प्रतिशत लड़कियों को ही घर से बाहर जाने की इजाजत मिलती है। और यह बाहर निकलना भी प्राय: काम पर जाने के लिए नहीं, बाजार, अस्पताल और आसपास के दर्शनीय स्थलों के दर्शन तक ही सीमित होता है। 1991 में भारत की तीन चौथाई महिलाएं खेत में काम करती थीं। यह हिस्सा अभी 59 फीसद के आसपास आ गया है। उद्योगों और सेवाओं में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है, लेकिन 2005 के बाद से इस दायरे में भी ठहराव या गिरावट देखी जा रही है। सबसे ज्यादा बुरा हाल मध्यम वर्गीय नौकरियों का है, जिनमें टिक पाना महिलाओं के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। सरकार को उद्यमियों से मिलकर इस बारे में कोई रास्ता निकालना चाहिए, वरना सिर्फ मुनाफे की फिक्र महिलाओं के साथ-साथ देश को भी गर्त में ले जाएगी।

today's edit- http://epaper.navbharattimes.com/paper/18-13@13-09@03@2018-1001.html

Tuesday, March 6, 2018

बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं

माया पारीक ने चार साल पहले लव मैरिज की थी। पारसी नेकजद से। पिछले साल अप्रैल में नेकजद हार्ट अटैक से मर गए। माया अब मायके में हैं क्योंकि नेकजद की फैमिली उन्हें वापस नहीं ले रही है। बार बार दोहराती हैं कि जो करना चाहती हैं, कर नहीं पा रही हैं। कहती हैं कि शादी के बाद जैसे-तैसे करके सबको ऑलमोस्ट मना लिया था। मगर अब नहीं मना पा रही हैं। नहीं मना पा रही हैं की बात उन्होंने चिट्ठी में नहीं बताई है, लेकिन अवचेतन के भय वहीं सुने जाते हैं, जहां चुप्पी होती है। जहां से कोई आवाज नहीं आती।

जो भय हमारी चेतना में होते हैं, उनके लिए हम कुछ न कुछ इंतजाम कर लेते हैं। दैहिक और आलमोस्ट मानसिक क्षतियों के लिए हमने कानून बना रखे हैं। जहां कानून नहीं हैं, वहां समाज, जाति और जितने हो सकते हैं, उन नामों के मुहर लगे नियम बना रखे हैं। आए दिन की जरूरत और नई मिलती समझ के साथ सब कुछ बदलते भी रहते हैं। फिर भी स्त्रियों का हाल बिलकुल भी नहीं बदला है तो वजह साफ है, कानून और समाज उनके असल भय तक पहुंच पाने में कामयाब नहीं है। अंदर से स्त्री को कोई छू ही नहीं रहा है। खुद स्त्री भी नहीं।

इस कॉलम के लिए काफी स्त्रियों ने अपनी सहेली की कहानियां भेजीं। कुछ ने बताया कि बंधकर बड़ी हुई उनकी सहेली ससुराल से बंधी तो सबसे पहले सास की पसंद की भिंडी और देवर के पसंद के पराठे बनाने सीखे। बच्चे पैदा किए। लड़की पैदा करने पर ताने झेले, मारपीट भी। बच्चे बड़े किए और अब अकेली है। पति होते हैं, मगर वह न होने के बराबर ही होते हैं। कुछ ने बताया कि उनकी सहेली ने फलां कपड़े पहन लिए तो पति देव पांच दिन तक फुंफकारते रहे। कुछ ने कहा कि वह अपने सहेली को समझाती हैं कि उसे कुछ करना चाहिए, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि उनकी ये सहेली कौन है? अपने यहां स्त्रियों ने अपने भय से बात करने की कला कुछ इसी तरह से विकसित की है, जिसका अंत निपट अकेलेपन के अंधेरे में खोया हुआ है।

वित्तीय सुरक्षा एक हद तक इस अंधेरे को साफ करने में कामयाब हुई है। पैसा कमाने वाली स्त्रियों में कमोबेश पैसा कमाने वाले पुरुषों जितनी ही बेफिक्री होती है। आखिरी अमेरिकी जनगणना बताती है कि स्त्रियों के पास वहां की कुल संपत्ति का 51 फीसद है। कुछ उन्हें मिलती है तो कुछ वह खुद कमाती हैं। इससे वह खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। अपने यहां जिस उम्र में आकर काफी सारी स्त्रियां अकेली हो जाती हैं, वहां उस उम्र में स्त्रियां जमकर जीना शुरू करती हैं। मगर फिर भी, वैसा जीना भी अवचेतन में बसे उस भय का स्थाई इलाज नहीं कर पा रहा है। अमेरिका की शिकागो और कॅलीफोर्निया यूनिवर्सिटी का एक संयुक्त अध्ययन बताता है कि वहां की लगभग आधी आबादी अवसादी अकेलेपन का शिकार है। 

कामकाजी होने के बावजूद स्त्रियां अवचेतन के भय पर खुलकर बात नहीं करतीं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें भरोसा नहीं है। कामकाजी तो दूर, स्त्री विमर्श और आंदोलनों से जुड़ी कई स्त्रियों ने इस विषय पर चुप्पी साध ली। संपत्ति की जायज मांग उठाएंगी की बात सभी ने बताई, लेकिन अपने घर में यह बात उठाई या नहीं उठाई, यह नहीं बताया। कानून और समाज अभी तक आधी आबादी के लिए जो कुछ कर पाया है, वह कहीं से भी पूरा नहीं है। और फिर पूरा हो भी जाएगा, तो भी यह भय खुलकर बह पाएगा, क्या कहा जा सकता है।

अवचेतन के भय को बहने के लिए भरोसे का ठोस मैदान चाहिए। जब यह मैदान स्त्री के पास होता है तो वह बहती है। बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं। अभी यह मैदान क्यों नहीं है, यह भय खुलकर बाहर क्यों नहीं आ रहा है, माया पारीक के पत्र की आखिरी लाइन इसे अच्छे से समझा देती है। वह कहती हैं,  ‘शादी करके किसी की लाइफ नहीं खराब करना चाहती। इसमें गलती किसी की भी नहीं है, लेकिन टाइम खराब चल रहा है।’

नोट: मैं कोई स्त्री विर्मशकर्ता नहीं। बनना भी नहीं है। स्त्रियों ने जो बताया, और जो नहीं बताया, बस वही लिखा है।

Sunday, March 4, 2018

एक और जज का तबादला: अमित शाह को बचाने की कोशिश



सोहराबुद्दीन मामले में आया जज लोया जैसा मोड़, जस्टिस रेवती मोहिते डेरे का क्यों किया गया तबादला? 

गुजरात में हुए सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में भी वही मोड़ ला दिया गया है जो जज लोया वाले मामले में कभी लाया गया था। गनीमत बस इतनी है कि इस मोड़ पर आने वाला जज जिंदा खड़ा है, जबकि जज लोया को जिंदा मार दिया गया था। सोहराबुद्दीन मामले की पुनर्विचार अर्जियां अभी तक जस्टिस रेवती मोहिते डेरे सुन रही थीं लेकिन 26 फरवरी से उन्हें जस्टिस एनडब्ल्यू सांबरे के हवाले कर दिया गया है। हालांकि जिम्मेदारियों में तब्दीली नियमित तौर पर होने वाले रोस्टर का हिस्सा है जहां ढेर सारी दूसरी बेंचों को भी बदला जाता है। लेकिन इस मामले में इस लिए लोगों की भौंहें तन गयी हैं क्योंकि सच्चाई ये है कि जस्टिस रेवती मोहिते डेरे पिछले तीन हफ्ते से मामले की सुनवाई कर रही हैं।

बांबे लायर्स एसोसिएशन (बीएलए) ने बांबे हाईकोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश वीके ताहिलरमानी को पत्र लिखकर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले को सुनवाई के लिए दूसरे जज को देने के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश को संबोधित और बीएलए अध्यक्ष अहमद आबदी द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है कि “जस्टिस डेरे केस के मामले में सीबीआई के रवैये को लेकर जिस तरह से लगातार उसे फटकार लगा रहीं थीं उससे (तबादले के फैसले को) खासकर साजिश माना रहा है।” जस्टिस रेवती डेरे का सीबीआई के रवैये को लेकर बेहद आलोचनात्मक रुख था। उन्होंने साफ-साफ कहा था कि सीबीआई कोर्ट को सहयोग नहीं कर रही है। उसकी तमाम कमियों के लिए उसे कई बार फटकार भी लगायी थी। उन्होंने सीबीआई और सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की ओर से दायर याचिकाओं का नियमित आधार पर सुनवाई शुरू कर दी थी। इतना ही नहीं पिछले महीने सोहराबुद्दीन मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा मीडिया कवरेज पर लगाए गई पाबंदी को भी हटा दिया था। नई जिम्मेदारी के मुताबिक जस्टिस रेवती डेरे अब जमानत, अग्रिम जमानत, और जमानत से जुड़ी अर्जियों की सुनवाई करेंगी।

बीएलए ने जो पत्र भेजा है, उसके मुताबिक 38 आरोपियों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत 15 को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है। सबसे बड़ी अचरज की बात ये है कि 42 गवाहों में 34 अपने बयानों से पलट गए हैं। बीएलए का कहना है कि “इस पृष्ठभूमि में जस्टिस डेरे के एसाइनमेंट को बदला जाना जनता में एक गलत संदेश भेज रहा है। और लोगों का न्यायपालिका की संस्था में विश्वास को भी कमजोर कर रहा है।” बीएलए ने अमित शाह के बरी होने को चुनौती देने के लिए सीबीआई को निर्देश देने संबंधी बांबे हाईकोर्ट में दायर एक पीआईएल को सुनवाई के लिए जस्टिस भूषण गवई की बेंच को दिए जाने पर भी सवाल उठाया है। जस्टिस गवई उन दो जजों में से एक हैं जिसने मीडिया को बताया है कि सीबीआई जज बीएच लोया की मौत में कुछ भी छुपाया नहीं जा रहा है। आपको याद होगा कि जज लोया जो सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे थे उनकी 1 दिसंबर को नागपुर में कथित तौर पर दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी थी। तब वो अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए वहां गए थे। जज की मौत की जांच के लिए ढेर सारी याचिकाएं दायर की गयी हैं।

इस मामले में बीएलए ने कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश से सुधारात्मक कार्रवाई करने की अपील की है। उसने कहा है कि “क्योंकि केवल न्याय नहीं होना चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।” इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बांबे हाईकोर्ट में सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई करने वाली जस्टिस मोहते डेरे को केस से हटाए जाने के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूरी प्रगति पर टिप्पणी करते हुए कांग्रेस चीफ ने मंगलवार को एक ट्वीट के जरिये कहा कि “सोहराबुद्दीन केस ने एक और जज को ले लिया। सीबीआई को चुनौती देने वाली जस्टिस रेवती डेरे को हटा दिया गया है।” उन्होंने पूछा कि “जज जेटी उत्पट ने अमित शाह से सुनवाई में उपस्थित होने के लिए कहा और हटा दिए गए थे। जज लोया ने कठिन सवाल पूछे। वो मर गए। इस बीच हाईकोर्ट ने मौजूदा सूची में बदलाव को रूटीन करार दिया है।

सुनवाई के दौरान 29 जनवरी 2018 को जस्टिस डेरे ने सीबीआई से पूछा था कि वह पुनर्विचार अर्जियों की तेजी से सुनवाई के लिए कोई इच्छा क्यों नहीं प्रकट कर रही है। जैसा कि ट्रायल स्पेशल सीबीआई कोर्ट में नवंबर 2017 से शुरू हो गया था। इस मामले में कुल 42 गवाह थे जिसमें 34 पहले ही पलट गए हैं। 12 फरवरी को सुनवाई के दौरान दो और गवाह पलट गए। इस पर जस्टिस रेवती डेरे ने सीबीआई से पूछा था कि गवाहों की सुरक्षा के लिए वो क्या कर रही है? लाइवलॉ वेबसाइट के हवाले से आयी खबर के मुताबिक जज ने कहा था कि “क्या ये सीबीआई की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वो गवाहों की रक्षा करे जिससे वो आरोपियों के सामने बेखौफ होकर अपना पक्ष रख सकें? इस बात पर विचार करते हुए कि ढेर सारे गवाह स्पेशल सीबीआई कोर्ट के सामने मुकर चुके हैं उन्होंने पूछा था कि क्या आप उन्हें कोई सुरक्षा देने जा रहे हैं? आपकी जिम्मेदारी केवल चार्जशीट भरने से नहीं पूरी हो जाती है। अपने गवाहों की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी है।” इससे आगे जाते हुए जज ने कहा कि “ आप एक मूक दर्शक नहीं हो सकते हैं। मैं उस तरह का सहयोग नहीं पा रही हूं जैसा मुझे सीबीआई की तरफ से मिलना चाहिए था। अगर यही आपका रवैया है तब आप ट्रायल ही क्यों चलवा रहे हैं।”

इस बीच हमने आरोपियों के बरी होने को चुनौती देने वाले सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन से बात की। उन्होंने बताया कि उनकी अपने वकील से बात हुई है और केस की अगली जो तारीख लगेगी उस मौके पर वो अपना एतराज जताएंगे। और मामले को जस्टिस मोहिते डेरे के पास ही रहने देने की अपील करेंगे। बताया जा रहा है कि इस तरह के मामलों में अभियोजन पक्ष या फिर याचिकाकर्ता मुख्य न्यायाधीश से अपील कर सकते हैं। खासकर ऐसे मामलों में जिनका बड़ा हिस्सा किसी जज ने सुन लिया हो। ऐसे में जिम्मेदारी को बदलने की जगह बाकी सुनवाई को भी उसके द्वारा ही पूरी किए जाने पर विचार हो सकता है। अंग्रेजी समाचार वेबसाइट स्क्रोल से बातचीत में बांबे हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ वकील ने कहा कि जजों का ये एसाइनमेंट रूटीन हो सकता है और उसमें शायद कोई असामान्य बात न हो लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि जस्टिस डेरे ने सभी पक्षों की ज्यादातर बहसों की सुनवाई पूरी कर ली थी।

पहले रुबाबुद्दीन का प्रतिनिधित्व कर चुके वकील विजय हीरेमथ ने कहा कि “8 या 10 सप्ताह में जिम्मेदारियों में बदलाव किया जाता है लेकिन इस केस में पिछले तीन हफ्ते से नियमित सुनवाई चल रही है। और बहुत ज्यादा बहसें पूरी हो चुकी हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “पूरे मामले की फिर से सुनवाई इसमें शामिल किसी के लिए भी समय की बर्बादी होगी।” वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि हालांकि हाईकोर्ट में रोस्टर में बदलाव कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। अगर एक जज कोई केस सुन चुका है तब उस केस को सामान्य तौर पर उसे ही भेज दिया जाता है और उसे एक हिस्से की सुनवाई हो चुके मामलों में रखा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर इस खास केस को उनके साथ नहीं रखा जाएगा तब ये निश्चित तौर पर एक असामान्य बात होगी और फिर रोस्टर में बदलाव एक गलत मंशा को दर्शाएगी। और खासकर उनकी सीबीआई के रवैये पर की गयी टिप्पणी को देखते हुए इसकी आशंका और बढ़ जाएगी। बांबे हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय थिप्से ने कहा कि “....इसमें एक सुधार हो सकता है- दोनों पक्ष चीफ जस्टिस से मिलकर उनसे केस को उसी जज के तहत जारी रखने की अनुमति हासिल कर सकते हैं।” उन्होंने कहा कि आमतौर पर जज खुद इस तरह का निवेदन नहीं करते हैं जब तक कि कोई एक पक्ष इस तरह का सुझाव नहीं देता है।

Tuesday, February 20, 2018

हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां

नये नवाचारों व नवशुचिताओं को नये सन्‍दर्भ देती, किंचित अटक-अटककर ही सही, महानगरीय अंतर्मन की उखड़ाहटों को एक नूतनभाव, हर्षोत्‍कंठ जो एक समर्थ रचनाशीलता में कमोबेश एक ऐंठी वाचालता व विचलनधर्म में बंधी, मगर साथ ही उतनी ही उन्‍मुक्‍त-उन्‍मत्‍त भी, बहती गंगा-सी शनै: शनै: स्‍वयं को प्रकटाना शुरु की है, उस पकड़ की ताकत व ताकत की पकड़ को बहुत ही मजबूत बिम्‍ब-विधानों में “हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां” में पढ़ा जा सकता है. रचनाकार धीमे-धीमे औधड़ावस्‍था को प्राप्‍त हो रहे राहुल राहीव राइजिंग पांडे द्वय हैं, इब्‍ने व सफ़ी किम्‍बा गुलशन व नन्‍दा की तरह जिनकी देह भले दो हो, आत्‍मा का स्‍वर एक और वही विचलनधर्मिता की बुनावटों में गहरे निबद्ध है. या ‘आबद्ध’ है? जो भी है, गहरे से है. उदासियों में घुली, करुणात्‍कता के उद्दंड मुहावरों व प्रीतिहीनता के मुंडेरों से कौंध-कौंधकर कूद लेने को मचलती, ये कहानियां न कहीं शुरु होती हैं, न आखिर में कहीं पहुंचती हैं. पहुंचना चाहती भी नहीं. क्‍योंकि अपनी गहरी चोटों व बदहवास बेचैनियों ने उन्‍हें पश्चिमी दिल्‍ली की दिल मसलनेवाली सड़कों पर बहुत पहले यह निर्मम सबक दिया है कि पहुंचने को भी वही तीन पत्रिकाएं हैं, और चाहने को चार नौकरियां, प्रेम कहीं नहीं है. प्रेमिल मनवंचनाओं के गाढ़े, धूसर कार्य व क्रिया-व्‍यापार हैं. और कैसी भी क्रियात्‍मकता, कर्तव्‍यशीलता क्रय-विनिमय के नये उचाट परिहासलोक में ही पहुंचकर अंतत: सांस लेती, किम्‍बा दम तोड़ती है. 

संदिग्‍ध विद्वनशीलता के सीमित प्रतिमानी क्षेत्रों के चंद आलोचन पंडितों के बीच हालांकि दबी-दबी ऐसी फुसफुसाहटें हैं कि नवस्‍वर की इस नयी रचनाशीलता में नया कुछ भी नहीं, उन पर सीधे-सीधे मलयभूमि व मलेशियाई उद्वेलनाकांत कथाकारों की स्‍पष्‍ट छाप है, जो कहीं आगे जाकर विधर्मी जापानी फिल्‍मकारों की नवधृष्‍टताओं में बहलती, अनंतर कहीं गुम जाती हैं, और राहुल राही व राइजिंग पांडे अभी सजग न हुए तो आगे भी ऐसी ही रहेंगी. गुम. जबकि लेखकद्वय का इस पर स्‍पष्‍ट मतांतर है, और अभी भी, यही मानना है कि उनका अनुभवाकाश पूर्वी उत्‍तरप्रदेश व दिल्‍ली के पश्चिमदेश से बाहर अगर कहीं उतरता है तो वह यू-ट्यूब पर ‘लूज़ टाक’ के कुछ अकिंचन वीडियो व हबीब जालिब के मनोहारी गायन को खाने, व अन्‍य दैनंदिन के दैन्‍य, दैहिक क्रियाओं की निष्‍पत्ति तक ही पहुंचने को जाता है और वहीं बना रहता है. मलयभूमि व मलेशियाई संसार को वह जानते हैं इसी संसार में कहीं है, मगर कहां है इसकी चिन्‍ता में नहीं पड़ते. अपरिचय के ऐसे वीरानों के साहित्‍य को तो वह रात के सपनों में भी नहीं पहचानते.

जो भी व जैसा भी हो, नवाचारी नवउत्‍कर्षशीलता में सीलती ये कहानियां हिन्‍दी के आकाश में धीमे-धीमे उतरती उसे गहरे अर्थों में भर रही हैं, यह गहरे संतोष का विषय है. कम से कम तीन पत्रिकाओं व चार नौकरियों के लिहाज़ से तो है ही. दु:खकातर प्रसंग इतना भर है कि उसी उद्यमशीलता में नीमअंधेर प्रकाशन (गाजियाबाद), किम्‍बा भावना एंड मिसिर पब्लिकेशंस (ओन्‍ली इंगलिश), कानपुर मालूम नहीं क्‍यों सामने आने व प्रकाशकीय जिम्‍मा उठाने में लजाये, सकुचाये हुए हैं. सोचनेवाली बात है “हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां” महानगरीय मलिन धुंधलकों को नवसंदर्भ देगी, या जो जहां देना है, उसे महानगर ही देता रहेगा?
- हिलते उत्कर्ष के शील- प्रमोद सिंह

Wednesday, December 27, 2017

FRDI Bill: क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है?

वैसे हम ये भी पूछ सकते हैं कि क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है? थ्योरिटिकली इसका जवाब हां है। मगर तब, जब कि बैंक अपनी तय सामाजिक भूमिका निभा रहे हों। अगर बैंक पैसों को सट्टा बाजार में लगा रहे हैं और इसी वजह से दुखी हैं तो यह ठीक नहीं है। क्योंकि ये वो काम नहीं है जिसके लिए इन बैंकों को बनाया गया है। बैंकों को बचाने के लिए टैक्स का पैसा थ्योरिटकली उपलब्ध‘होना चाहिए, लेकिन बैंकों की सट्टा बाजारी जैसी हरकतों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण भी होना चाहिए।

अकेले उनका सरकारी होना एनफ नहीं है। इसके अलावा, टैक्सपेयर्स और बैंक में पैसा जमा करने वालों के बीच चलने वाला ये पूरा पचड़ा एक छलावा है जिसे एफआरडीआई विधेयक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए के बारे में इतना हल्लागुल्ला होने के बावजूद, ये संपत्तियां बैंक की कुल परिसंपत्तियों का लगभग 12 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इस तरह का तकरीबन 90 प्रतिशत एनपीए राष्ट्रीयकृत बैंकों का है। लेकिन कुल बैंकिंग व्यवसाय में ऐसे बैंकों के बड़े हिस्से को देखते हुए उनके एनपीए का भार इतना अधिक नहीं है कि उसे किसी तरह के खतरे की घंटी समझा जाए।  इसके अलावा, सरकार ने अभी-अभी सवा दो लाख करोड़ रुपये के रीकैपिटलाइजेशन की घोषणा की है। इसलिए अब तो बैंकों के पास तो पैसे ही पैसे हैं और सबकी हालत ठीक है। और आगे भी ठीक ही रहनी है।

अरुण जेटली संसद में ये जो बिल लाए हैं, इसे वह टैक्सपेयर्स और बैंक डिपॉजिटर्स के बीच हितों के संघर्ष की कल्पना करके ठीक कहने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा तो बस एक ही हाल में हो सकता है, जो अभी दूर-दूर तक नहीं दिख रहा। और अगर होगा भी तो उसे रोकने के कई तरीके हैं, जिनमें से एक चीज है सावधानी। लेकिन सावधानी को सरकार ने छह से दस बजे तक के लिए बैन कर दिया है। सरकार बिस्तर से लेकर बैंक तक बेतुकी बातें ही नहीं कर रही, बल्कि बेहद बदमाशी भरे फैसले भी करने की तैयारी में है। प्राइवेट कंपनी के लोन डिफाल्टर देश के कुल एनपीए में 75 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं, उनका गबन उन्हीं से वसूला जाना चाहिए। मगर अब ऐसा नहीं होगा। अब सरकार बहादुर ओपड़ी दी गुड़गुड़ फिटे मुंह पाकिस्तान टू दी हिंदुस्तान का इंतजाम है कि लोन लेकर भागने वालों का पैसा हम आप जैसे लोग भरेंगे, क्योंकि हम बैंक में पैसे जमा करते हैं।
समाप्त
Story- Pro. Prabhat Patnayak

पार्ट- 1- 

पार्ट- 2- 

पार्ट- 3- 

पार्ट- 4- 

पार्ट- 5- 

पार्ट- 6- 

FRDI Bill: बेहाल बैंकों की इक्विटी की औकात क्या होगी

वित्त मंत्री अरुण जेटली कह तो रहे हैं कि हमारे हितों की रक्षा की जाएगी; लेकिन यह बता ही नहीं रहे कि कैसे करेंगे रक्षा? एफडीआरआई बिल में बैंक की हालत के पतली होने की हालत में जिन लोगों की रकम सुरक्षित रखी जाएगी, उनकी लिस्ट बनी है। इस लिस्ट में बैंकों में जिनकी रकम का बीमा नहीं होता, वो पांचवे नंबर पर हैं। सरकार का दावा है कि उनकी रकम खत्म तो नहीं होगी, मगर उनकी रकम को इक्विटी में बदल दिया जाएगा।

कुल मिलाकर ऐसा माना जा रहा है कि बैंक जब नाजुक हालत में होंगे तब इस बिल के तहत वो हमारे जमा पैसे से अपना सारा घाटा पूरा कर लेंगे। और फिर इसी बिल से एक सुरंग और निकल रही है। ये सुरंग सार्वजनिक क्षेत्र के सारे बैंकों के प्राइवेट बाजार में निकल रही है। वैसे हमारी जिस रकम को इक्विटी में बदलकर बचाने का दावा सरकार कर रही है, वो दावा भी तकरीबन खोखला ही है।

जब बैंकों की हालत खराब होगी और हमारी जमा को इक्विटी में बदला जाएगा, तब इक्विटी की भी वैल्यू अपने आप कम हो जाएगी। इसलिए बैंकों में जितना पैसा हमारा जमा होगा, उसकी भी वैल्यू कम हो जाएगी। यानि घाटा होना तय है। इसके अलावा हमें अगर अपना पैसा चाहिए होगा तो इस इक्विटी को निजी कंपनियों को बेचना ही पड़ेगा। और अगर बैंक अपनी इक्विटी निजी कंपनियों को बेचते हैं तो जानते हैं क्या होगा? फिर बैंकों की मालिक निजी कंपनियां होंगी। फिर सारे बैंक प्राइवेट होंगे। यानि कि इस बिल में चाहे कोई सरकारी टीम काम करे या प्राइवेट, होना यही है कि बैंक निजी कंपनियों के हाथ कौड़ियों के मोल बिकने हैं। और इस काम के लिए संसद से भी न तो पूछा जाएगा और न ही बताया जाएगा। सीधे कार्यपालिका ही बैंकों को बेभाव लुटा सकेगी।
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी

पार्ट- 1- 

FRDI Bill: मजा मारें गाजी मियां, धक्का सहें डफाली

वैसे इतना महीन बिल मोदी जी के करामाती और फोटोशॉप से भी तेज दिमाग से नहीं निकला है। दस साल पहले सन दो हजार आठ में जब दुनिया में मंदी आई थी, तब फाइनेंशियल स्टैबिलिटी बोर्ड बना था। ये बिल उसी की सिफारिशों पर बना है। ताकि यह पक्का हो सके कि भविष्य में ऐसे संकटों में जब भी वित्तीय प्रणाली फंसे तो उसके लिए अलग से बजट न रखा जाए। उस वक्त अमेरिका ने भी यही किया था और वहां लोग सबसे ज्यादा तबाह हुए थे। भारत जी-20 देशों में से एक था, जिसने इस बोर्ड की सिफारिशों को स्वीकार किया था। एफआरडीआई विधेयक इसी का नतीजा है।

लेकिन हम जैसे टैक्स देने वालों से मिले पैसे से किसी निजी कंपनी या इंस्टीट्यूट को बचाने और सरकारी इंस्टीट्यूट को बचाने के बीच एक बहुत बड़ा फर्क है। एक में कोई वैधता नहीं है तो दूसरे में वैधता है। असल में सरकार बैंकों को खुद ही इस तरह की जहरीली और नुकसानदेह परिसंपत्तियों से दबने से रोक सकती है, जिससे हम टैक्स देने वालों के पैसे से बैंकों के बचाए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होना चाहिए। और निश्चित रूप से जैसा अमेरिका में हुआ, उतने बड़े पैमाने पर तो बिलकुल नहीं पैदा होना चाहिए।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उस वक्त भी भारत में राष्ट्रीयकृत बैंकों की  ये जहरीली या हानिकारक परिसंपत्तियां इतनी कम थीं कि प्राइवेट सेक्टर के झंडाबरदारों को भी यह मानना पड़ा कि बैंक राष्ट्रीयकरण के कारण भारत बाकी दुनिया की तरह फंसा नहीं था, बल्कि हमारी हालत अच्छी थी। इसलिए, तरक्की के हिमालय पर बैठे पूंजीवादी देशों के इस आइडिया को अपने यहां भारत में अपनाने का विचार बेतुका है।
इस आइडिया में धन्ना सेठों को ढेर सारी ऐसी पूंजी मिल जाएगी जिसे बैंक हमारी जेब से वापस लेंगे। मतलब मजा मारें गाजी मियां, धक्का सहें डफाली। और इकॉनामी और उससे जुड़े मामलों में हमारी मोदी सरकार तो पहले ही कितनी समझदार है, पिछले तीन सालों से हम देख ही रहे हैं। ऐसे में ये नए नए पंडितों के बताए रास्ते पर अंधी होकर चल रही है और न डफाली को देख पा रही है और न ही धक्के को।
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी

पार्ट- 1- 

नोटबंदी और एफआरडीआई बिल में कंपनियों की खुली लूट

मगर अब ये दीवार दरक जाएगी। ये भरोसा कमजोर हो जाएगा। नोटबंदी ने कागज के इन नोटों पर से हमारा भरोसा पहले ही हटा दिया था। मोदी जी ने वादा भी किया था कि ऐसे झटके तो लगते रहेंगे। गनीमत रही कि नोटबंदी में पैसों का नुकसान नहीं हुआ। बस हमें लंबी लंबी लाइनें लगानी पड़ीं, थोड़ा रोना पड़ा, थोड़ा लड़ना पड़ा और पैसे न मिलने पर ढेर सारा कुढ़ना पड़ा। शादी ब्याह कर रहे थे या मकान बनवा रहे थे, सब रुक गया, सब थम गया। और बची रह गई कुढ़न।

जैसे हाथ में रखे पैसे पर से भरोसा टूटा, वैसे ही बैंक में रखा पैसा, यानि कि रकम बहुत दिन तक सेफ असेट नहीं रहने वाली। एफआरडीआई बिल में सरकार की सारी बीमा और दूसरी वित्तीय कंपनियां शामिल हैं। इसलिए इस बिल के बाद जैसे बैंक डिपॉजिट में हमारा भरोसा नहीं रह जाएगा, वैसे ही बीमा और इन्वेस्टमेंट के दूसरे सारे तरीकों पर से हमारा भरोसा उठ जाएगा।
क्योंकि जमा तो कहीं भी करें, हमारा कुछ भी जमा सेफ होने की कोई सरकारी गारंटी नहीं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां लोगों को न पैसे का भरोसा हो, न बैंक पर यकीन हो और न ही किसी दूसरे तरह की जमाओं पर विश्वास हो, उसका क्या हाल होने वाला है, ये बात बुद्धि में आ रही है या नहीं? फिर पैसे कैसे बचाएंगे? फिर तो सबसे सेफ होगा सोना, जमीन या हीरे, जवाहरात, अशरफियां। बिटकॉइन? नहीं, अब तो उसपर भी इनकमटैक्स वाले लग गए। रखेंगे कैसे? जैसे हमारे परदादा और लकड़दादा रखते आए हैं। डिजिटल इकॉनमी की ऐज में मोदी सरकार हमें भगवान राम के युग में लेकर जा रही है। रामराज आ रहा है।  सब राम जी का है ना?
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी



पार्ट- 1- 

एफआरडीआई बैंकों का भरोसा तोड़ देगा

अभी क्या है कि अकाउंट में एक लाख रुपये तक जमा होते हैं तो उनका पूरा इंश्योरेंस होता है। बैंक डूब जाए, भाग जाए, लुट जाए, जल जाए, तो भी हमारा पैसा सेफ रहता है।
ये इंश्योरेंस एलआईसी नहीं करती है। इसके लिए बाकायदा डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन है। ये रिजर्व बैंक की सहायक कंपनी है। इस बिल में इसे बंद कर देंगे और इसकी जगह इसके जैसा कोई दूसरा कॉरपोरेशन नहीं खोला जाएगा।
लेकिन इससे भी जरूरी बात तो ये है कि बैंकों पर हमारे भरोसे की वजह सिर्फ ये कॉरपोरेशन ही नहीं था। हमें भरोसा इसलिए भी था कि हमारी सरकार बैंकों की मालिक है और अगर कभी ये बैंक फेल हुए तो कम से कम वो तो इनके पीछे खड़ी है।

यह वही विश्वास है, वही यकीन है जिसकी वजह से हमारे आप जैसे लाखों लोग जाने कैसे और किन जरूरतों को सोचकर बैंकों में पैसा जमा करते रहे हैं। और इस जमा के बदले में हमें जो ब्याज मिलता है, वो तो डिपाजिट शेयर, म्यूचुअल फंड और कई तरीकों के हिसाब से बहुत कम होता है। मगर भरोसा तो होता है।
अब ये भरोसा, हमारा ये यकीन खत्म हो जाएगा। पहले जब लोग बैंकों पर भरोसा नहीं करते थे तो वो जाने कहां कहां अपना पैसा छुपाकर रखते थे। बक्सों में, जमीन के अंदर, पुराने तहखानों में या दीवार के पीछे।
लोग मानते थे कि बैंक नाम की जो चीज है, उसकी अपनी कोई गुडविल नहीं है और वो कुछ  अज्ञात किस्म के निजी ऑपरेटर चलाते हैं। लेकिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने इस तरह की सोच बदल डाली। हममें भरोसा जागा कि अब तो सब बैंक सरकार के हैं और सरकार हमारा पैसा लेकर कहां जाएगी। वापस तो करेगी ही।
जारी
Story- Pro. Prabhat Patnayak



पार्ट- 1- 

बैंकों में जमा हमारे पैसे डूबने वाले हैं- 1

ऐसा लगता है कि बीजेपी सरकार जब तक देश की अर्थव्यवस्था का ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हट फिटे मुंह न कर ले, उसे चैन नहीं मिलने वाला। इस ओपड़ी दी गुड़गुड़ दी पाकिस्तान की ओर बीजेपी सरकार ने फाइनेंशियल रिजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इश्योरेंस बिल यानि कि एफआरडीआई बिल लाकर छलांग लगा दी है। इस बिल में एक रिजोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाया जाएगा। इस कॉरपोरेशन में काम करने वाले ज्यादातर लोग केंद्र सरकार के होंगे। इसके तहत किसी बैंक की हालत पतली होने की हालत में जमाकर्ताओं और क्रेडिटर्स के पैसों को बैंक से उधार लेकर गड़प्प वाले डिफाल्टरों को बचाने में यूज करेंगे।

अभी तक इस तरह के कामों के लिए केंद्र सरकार के पास पैसा होता था। यही पैसा बैंकों के ‘बेल आउट’ के लिए यूज करते थे। अब ये बेल आउट को आउट कर देंगे और सोच रहे हैं कि बेल इन को इन कर दें। बेल इन करने पर जो जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होती थी, जिसके लिए उसके पास पैसा होता था, वो हमारी जेब की है। अब कोई दिवालिया होगा तो सरकार बहादुर अपनी जेब से नहीं देंगे। बल्कि हमें अपनी जेब से देने होंगे। इसके लिए चाहे बैंक में पैसे जमा करने वाले हों या बैंक से लोन लेकर वह पैसे बैंक में रखने वाले हों, दोनों की जेब कुतरी जाएगी। बल्कि कुतरी क्यूं भई? ये बिल पास हो गया तो काटी जाएगी।
जारी--
Story- Pro. Prabhat Patnayak


पार्ट- 1- 

Monday, January 27, 2014

ओउलेई ओडलेई ओ ऊ....

पता है... मुझे चुप कराना आता है। कभी कभी सोचता हूं कि कहीं ये कि‍सी मर्द का काम तो नहीं.... जिंदगी एक सफर है सुहाना....ओउलेई ओडलेई ओ ऊ....। अचानक ये लगता पूर्णवि‍राम नहीं अच्‍छा लगता ना...पर ये अचानक ही तो लगता है। बहरहाल, एक फोन करना है जरूरी।


Loading...




मुझमें क्‍या कमी है...

मुझमें क्‍या कमी है...अगर ये सवाल है तुम्‍हारा तो मेरा जवाब है कि मुझमें एक नहीं, लाखों करोड़ों कमि‍यां हैं। मैं संबंधों को समझने में गलत रहता हूं और नि‍भाने में भी। मुझे नहीं पता कि नाप तौल के कैसे संबंध नि‍भाते हैं। मेरी सबसे बड़ी कमी तो ये कि मैं गलत वक्‍त पर सही बात बोल देता हूं। मैं लापरवाह हूं और दूसरों के काम चुटकि‍यों में और अपने काम सालों में भी नहीं करता। मेरी कमि‍यों पर तो दुनि‍या के सारे कागज अधूरे पड़ेंगे।


Loading...




मैं कोई भी पुराना काम नहीं करता

मैं आजकल बीड़ी पीता हूं। जिंदगी में कभी नहीं पी, इसलि‍ए पीता हूं। इतना ही नहीं, दुनि‍या में जो सबसे नया काम होता है, मैं वो करता हूं। मैं कोई भी पुराना काम नहीं करता। यहां तक कि शादी डॉट कॉम पर एक प्रोफाइल को दोबारा रि‍क्‍वेस्‍ट भी नहीं भेजता। मैं सबकुछ नया करता हूं। मैं परेशान हूं यादों से। मैं यादों को याद नहीं करना चाहता, इसलि‍ए नया काम करता हूं। फि‍र भी...


Loading...




सुख हो या ना हो, दुख जरूर होता है

पता है...हर चेहरे पर एक याद बसी है। हर चेहरे पर एक दुनि‍या बसी है। खामोश चेहरे जो सपनीले तरीके से बाहर चलती हवा को महसूस करते हैं, कि‍तनी यादें बसी हैं उनमें। वो आंखें, जो पथराई सी है, कि‍तनी खामोशी है उनमें...और कि‍तनी दूरी। यादें हैं कि उन आंखों की पुतलि‍यों को हि‍लने ही नहीं देते। झुर्रियां हों या ना हों, यादें जरूर होती हैं। सुख हो या ना हो, दुख जरूर होता है। 

वो मन में पूरा बाजार लगा देती हैं

हर कोई अपनी यादों से परेशान होता है। यादें हर वक्‍त परेशान करती हैं। उन्‍हें तो बस कहीं भी एक झरोखा चाहि‍ए और वो मन में पूरा बाजार लगा देती हैं। और घेर देती हैं मुझे एक कभी न खत्‍म होने वाले शोर से। शोर ऊपर से, नीचे से, दाएं-बाएं और सामने से, हर जगह से कानों में भरता जाता है। कानों में गर्म तेल पड़ता जाता है। 

चलते तो जाना ही है

ठीक है मैं टूटा। मैं मानता हूं कि मैं बुरी तरह से टूटा और लगातार टूट रहा हूं। दि‍न भर में जि‍तना बनाता हूं, दि‍न के एक पल में वो टूट जाता है और मैं फि‍र से बनाना शुरू कर देता हूं। वैसे टोटल देखो तो मैं बनाने के काम में ज्‍यादा लगा हूं। भले ही मेरा बनाया कि‍सी एक पल में खत्‍म हो जा रहा हो और मैं फि‍र से अपने आपको लुटा पि‍टा एक बि‍याबान सड़क पर खड़ा पाता हूं। ढाल और चढ़ाव से भरी सड़क। जि‍स पर मुझे चलते जाना है, गि‍र गि‍र के...घि‍सट घि‍सट के, पर चलते तो जाना ही है।

Saturday, July 7, 2012

ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही हो सकता है...


ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही हो सकता है...भारत के लिये पदक लाने वाली ख्रिलाडी पर पुरुष होने का आरोप लगाया जाता है और वो महिला है या पुरुष, ये जाने बगैर उसे उन वहशी दरिन्दो के साथ बन्द कर दिया जाता है, जो पहले से ही पगलाये, इन्सानी गोश्त के बेरहम तलब्रगार है....क्या इसी दिन के लिये पिन्की ने दिन रात एक कर दिया था?? हे मेरे कानून....खिलाडी होने का वेटेज तो सब जगह होता है....कम से कम इसका तो ध्यान रखा. कम से कम पुलिस को तो इस तरह पिन्की के सीने पर हाथ डालने से पहले सोचना था.....दोस्तो...खेल भावना के साथ...इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे... — with Rajiv Taneja and 37 others.
 ·  ·  · Yesterday at 1:03am ·