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Wednesday, March 21, 2018

नोटबंदी के बाद मार्केट में कहां से आया इतना कैश?

8 नवंबर 2016 की रात को अचानक मोदी जी के मन में नोटबंदी का लड्डू कैसे और क्यों फूटा, सही-सही तो वही बता सकते हैं, लेकिन उन्होंने हमें जो नोटबंदी का जो कालाधन टाइप का झूठ बताया था, उसकी पोलपट्टी खुलती जा रही है। वैसे भी, पोलपट्टी झूठ की ही खुलती है। शुक्र है मोदी जी धोती नहीं पहनते। बहरहाल, रिजर्व बैंक ऑफ मोदिया की ही रपट है कि अभी बाजार में जितना पैसा सर्कुलेशन में है, वह उन नंबर्स से कहीं ज्यादा है, जो नोटबंदी के पहले रिजर्व बैंक के पास थे। मतलब नोटबंदी के पहले मार्केट में जितना पैसा तैर रहा था, अब उससे कहीं ज्यादा तैर रहा है।

नोटबंदी के बाद नोटों का, हमारा, अर्थव्यवस्था का क्या हुआ और क्या होता जा रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है। हम लाइनों में लगे, लाठी खाई, टांगें तुड़वाईं, गाली खाई, लड़े और लड़ने के बाद पता चला कि कालाधन तो सफेदधन कर लिया गया। वह भी बगैर कोई टैक्स चुकाए। अभी तक सरकार इसका एक्यूरेट आंकड़ा नहीं दे पाई है कि नोटबंदी के बाद कितना कालाधन उसने सफेद किया और सफेद करने के कितने पैसे लिए।

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि 8 नवंबर से पहले देश में 17.97 ट्रिलियन करेंसी फ्लो में थी। तब मोदी महान ने ताली पीट-पीटकर कहा था कि कालाधन वाले माथा पीट रहे हैं, और ताली बजा बजाकर करोड़ों लोगों को बेवकूफ बनाया था। अब आरबीआई बता रहा है कि 8 मार्च 2018 यानी इसी महीने बाजार में कैश सर्कुलेशन 18.13 ट्रिलियन रुपये हो चुका है। मजे की बात यह कि अभी खुद आरबीआई को नहीं पता कि इसमें उसने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और इनके लत्ते-गत्ते के कड़क नोट शामिल हैं या नहीं। वैसे अगर नरेंद्र मोदी के इन चाहने वालों के भी पैसे इसमें जोड़ दिए जाएं तो अमाउंट और भी बढ़ जाएगा।

अरे हां, नोटबंदी के पीछे मोदी महान ने एक और तर्क दिया था- डिजिटाइजेशन। आरबीआई की ही रिपोर्ट कहती है कि अक्टूबर 2017 से फरवरी 2018 तक के बीच में डेबिट-क्रेडिट कार्ड से होने वाले भुगतानों में मोदी महान जितनी ही गिरावट आ चुकी है। पिछले साल 28 अगस्त 2017 में आरबीआई ने ही बताया था कि नोटबंदी के बाद सिर्फ 1 फीसद नोट वापस नहीं आए, बाकी जितने छापे थे, सब वापस आ गए। मगर कालाधन? आया? पंद्रह लाख? आए? नौकरी? आई? हुंह। 

Thursday, March 8, 2018

महिलाओं के लिए मुश्किल

भारत में औरतें काम से बाहर हो रही हैं। देश की कार्यशक्ति का हिस्सा बनने वाली महिलाओं का प्रतिशत पिछले बारह वर्षों में सीधे दस फीसदी नीचे आ गया है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए यह खबर भयंकर बेचैनी पैदा करने वाली होती, लेकिन हमारे यहां तो इस पर बात भी नहीं हो रही है। वर्ल्ड बैंक के आंकड़े बता रहे हैं कि 2005 में 15 साल से ज्यादा उम्र की लगभग 36 फीसदी महिलाएं वेतन या मजदूरी के एवज में कहीं न कहीं काम कर रही थीं। लेकिन 2017 में ऐसी महिलाओं का हिस्सा सिमटकर 25.9 फीसदी पर आ गया। इसका असर देश की कुल श्रमशक्ति में कमी के रूप में देखा जा रहा है। सन 2016 में चीन का प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत का 2.4 गुना था, जबकि प्रति कामगार जीडीपी 1.7 गुना दर्ज किया गया। लेकिन तीन दशक पहले चीन उत्पादन से लेकर कमाई तक में भारत से पीछे था। उसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी भारत से कम तो थी ही, प्रति कामगार जीडीपी भी भारत से कम थी। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक सन 1991 में इन दोनों ही मामलों में चीन का दर्जा भारत से नीचे था। लेकिन चीन की तेज तरक्की के पीछे तकनीकी बढ़त के अलावा खास बात यह देखी गई कि वहां की श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी भारत से कहीं ज्यादा है। पिछले साल के आंकड़े के मुताबिक भारत की 25.9 प्रतिशत के मुकाबले चीन की 60.4 प्रतिशत महिलाएं बाहर निकलकर किसी कार्यस्थल पर अपनी सेवाएं दे रही थीं। मामले का दूसरा पहलू यह है कि कुल महिलाओं में कामकाजी महिलाओं का हिस्सा धीमी रफ्तार से ही सही, लेकिन पूरी दुनिया में गिर रहा है, पर इस गिरावट में जितनी तेजी भारत में दर्ज की गई है, उसकी कहीं और कल्पना भी करना मुश्किल है। इसकी वजहों पर जाएं तो हाल का नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे बताता है कि 15 से 19 वर्ष तक की 78.3 फीसद लड़कियों को हम घर से बाहर जाने ही नहीं देते, जबकि 20 से 24 साल की 30.8 प्रतिशत लड़कियों को ही घर से बाहर जाने की इजाजत मिलती है। और यह बाहर निकलना भी प्राय: काम पर जाने के लिए नहीं, बाजार, अस्पताल और आसपास के दर्शनीय स्थलों के दर्शन तक ही सीमित होता है। 1991 में भारत की तीन चौथाई महिलाएं खेत में काम करती थीं। यह हिस्सा अभी 59 फीसद के आसपास आ गया है। उद्योगों और सेवाओं में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है, लेकिन 2005 के बाद से इस दायरे में भी ठहराव या गिरावट देखी जा रही है। सबसे ज्यादा बुरा हाल मध्यम वर्गीय नौकरियों का है, जिनमें टिक पाना महिलाओं के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। सरकार को उद्यमियों से मिलकर इस बारे में कोई रास्ता निकालना चाहिए, वरना सिर्फ मुनाफे की फिक्र महिलाओं के साथ-साथ देश को भी गर्त में ले जाएगी।

today's edit- http://epaper.navbharattimes.com/paper/18-13@13-09@03@2018-1001.html

Tuesday, March 6, 2018

बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं

माया पारीक ने चार साल पहले लव मैरिज की थी। पारसी नेकजद से। पिछले साल अप्रैल में नेकजद हार्ट अटैक से मर गए। माया अब मायके में हैं क्योंकि नेकजद की फैमिली उन्हें वापस नहीं ले रही है। बार बार दोहराती हैं कि जो करना चाहती हैं, कर नहीं पा रही हैं। कहती हैं कि शादी के बाद जैसे-तैसे करके सबको ऑलमोस्ट मना लिया था। मगर अब नहीं मना पा रही हैं। नहीं मना पा रही हैं की बात उन्होंने चिट्ठी में नहीं बताई है, लेकिन अवचेतन के भय वहीं सुने जाते हैं, जहां चुप्पी होती है। जहां से कोई आवाज नहीं आती।

जो भय हमारी चेतना में होते हैं, उनके लिए हम कुछ न कुछ इंतजाम कर लेते हैं। दैहिक और आलमोस्ट मानसिक क्षतियों के लिए हमने कानून बना रखे हैं। जहां कानून नहीं हैं, वहां समाज, जाति और जितने हो सकते हैं, उन नामों के मुहर लगे नियम बना रखे हैं। आए दिन की जरूरत और नई मिलती समझ के साथ सब कुछ बदलते भी रहते हैं। फिर भी स्त्रियों का हाल बिलकुल भी नहीं बदला है तो वजह साफ है, कानून और समाज उनके असल भय तक पहुंच पाने में कामयाब नहीं है। अंदर से स्त्री को कोई छू ही नहीं रहा है। खुद स्त्री भी नहीं।

इस कॉलम के लिए काफी स्त्रियों ने अपनी सहेली की कहानियां भेजीं। कुछ ने बताया कि बंधकर बड़ी हुई उनकी सहेली ससुराल से बंधी तो सबसे पहले सास की पसंद की भिंडी और देवर के पसंद के पराठे बनाने सीखे। बच्चे पैदा किए। लड़की पैदा करने पर ताने झेले, मारपीट भी। बच्चे बड़े किए और अब अकेली है। पति होते हैं, मगर वह न होने के बराबर ही होते हैं। कुछ ने बताया कि उनकी सहेली ने फलां कपड़े पहन लिए तो पति देव पांच दिन तक फुंफकारते रहे। कुछ ने कहा कि वह अपने सहेली को समझाती हैं कि उसे कुछ करना चाहिए, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि उनकी ये सहेली कौन है? अपने यहां स्त्रियों ने अपने भय से बात करने की कला कुछ इसी तरह से विकसित की है, जिसका अंत निपट अकेलेपन के अंधेरे में खोया हुआ है।

वित्तीय सुरक्षा एक हद तक इस अंधेरे को साफ करने में कामयाब हुई है। पैसा कमाने वाली स्त्रियों में कमोबेश पैसा कमाने वाले पुरुषों जितनी ही बेफिक्री होती है। आखिरी अमेरिकी जनगणना बताती है कि स्त्रियों के पास वहां की कुल संपत्ति का 51 फीसद है। कुछ उन्हें मिलती है तो कुछ वह खुद कमाती हैं। इससे वह खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। अपने यहां जिस उम्र में आकर काफी सारी स्त्रियां अकेली हो जाती हैं, वहां उस उम्र में स्त्रियां जमकर जीना शुरू करती हैं। मगर फिर भी, वैसा जीना भी अवचेतन में बसे उस भय का स्थाई इलाज नहीं कर पा रहा है। अमेरिका की शिकागो और कॅलीफोर्निया यूनिवर्सिटी का एक संयुक्त अध्ययन बताता है कि वहां की लगभग आधी आबादी अवसादी अकेलेपन का शिकार है। 

कामकाजी होने के बावजूद स्त्रियां अवचेतन के भय पर खुलकर बात नहीं करतीं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें भरोसा नहीं है। कामकाजी तो दूर, स्त्री विमर्श और आंदोलनों से जुड़ी कई स्त्रियों ने इस विषय पर चुप्पी साध ली। संपत्ति की जायज मांग उठाएंगी की बात सभी ने बताई, लेकिन अपने घर में यह बात उठाई या नहीं उठाई, यह नहीं बताया। कानून और समाज अभी तक आधी आबादी के लिए जो कुछ कर पाया है, वह कहीं से भी पूरा नहीं है। और फिर पूरा हो भी जाएगा, तो भी यह भय खुलकर बह पाएगा, क्या कहा जा सकता है।

अवचेतन के भय को बहने के लिए भरोसे का ठोस मैदान चाहिए। जब यह मैदान स्त्री के पास होता है तो वह बहती है। बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं। अभी यह मैदान क्यों नहीं है, यह भय खुलकर बाहर क्यों नहीं आ रहा है, माया पारीक के पत्र की आखिरी लाइन इसे अच्छे से समझा देती है। वह कहती हैं,  ‘शादी करके किसी की लाइफ नहीं खराब करना चाहती। इसमें गलती किसी की भी नहीं है, लेकिन टाइम खराब चल रहा है।’

नोट: मैं कोई स्त्री विर्मशकर्ता नहीं। बनना भी नहीं है। स्त्रियों ने जो बताया, और जो नहीं बताया, बस वही लिखा है।

Wednesday, December 27, 2017

FRDI Bill: क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है?

वैसे हम ये भी पूछ सकते हैं कि क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है? थ्योरिटिकली इसका जवाब हां है। मगर तब, जब कि बैंक अपनी तय सामाजिक भूमिका निभा रहे हों। अगर बैंक पैसों को सट्टा बाजार में लगा रहे हैं और इसी वजह से दुखी हैं तो यह ठीक नहीं है। क्योंकि ये वो काम नहीं है जिसके लिए इन बैंकों को बनाया गया है। बैंकों को बचाने के लिए टैक्स का पैसा थ्योरिटकली उपलब्ध‘होना चाहिए, लेकिन बैंकों की सट्टा बाजारी जैसी हरकतों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण भी होना चाहिए।

अकेले उनका सरकारी होना एनफ नहीं है। इसके अलावा, टैक्सपेयर्स और बैंक में पैसा जमा करने वालों के बीच चलने वाला ये पूरा पचड़ा एक छलावा है जिसे एफआरडीआई विधेयक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए के बारे में इतना हल्लागुल्ला होने के बावजूद, ये संपत्तियां बैंक की कुल परिसंपत्तियों का लगभग 12 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इस तरह का तकरीबन 90 प्रतिशत एनपीए राष्ट्रीयकृत बैंकों का है। लेकिन कुल बैंकिंग व्यवसाय में ऐसे बैंकों के बड़े हिस्से को देखते हुए उनके एनपीए का भार इतना अधिक नहीं है कि उसे किसी तरह के खतरे की घंटी समझा जाए।  इसके अलावा, सरकार ने अभी-अभी सवा दो लाख करोड़ रुपये के रीकैपिटलाइजेशन की घोषणा की है। इसलिए अब तो बैंकों के पास तो पैसे ही पैसे हैं और सबकी हालत ठीक है। और आगे भी ठीक ही रहनी है।

अरुण जेटली संसद में ये जो बिल लाए हैं, इसे वह टैक्सपेयर्स और बैंक डिपॉजिटर्स के बीच हितों के संघर्ष की कल्पना करके ठीक कहने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा तो बस एक ही हाल में हो सकता है, जो अभी दूर-दूर तक नहीं दिख रहा। और अगर होगा भी तो उसे रोकने के कई तरीके हैं, जिनमें से एक चीज है सावधानी। लेकिन सावधानी को सरकार ने छह से दस बजे तक के लिए बैन कर दिया है। सरकार बिस्तर से लेकर बैंक तक बेतुकी बातें ही नहीं कर रही, बल्कि बेहद बदमाशी भरे फैसले भी करने की तैयारी में है। प्राइवेट कंपनी के लोन डिफाल्टर देश के कुल एनपीए में 75 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं, उनका गबन उन्हीं से वसूला जाना चाहिए। मगर अब ऐसा नहीं होगा। अब सरकार बहादुर ओपड़ी दी गुड़गुड़ फिटे मुंह पाकिस्तान टू दी हिंदुस्तान का इंतजाम है कि लोन लेकर भागने वालों का पैसा हम आप जैसे लोग भरेंगे, क्योंकि हम बैंक में पैसे जमा करते हैं।
समाप्त
Story- Pro. Prabhat Patnayak

पार्ट- 1- 

पार्ट- 2- 

पार्ट- 3- 

पार्ट- 4- 

पार्ट- 5- 

पार्ट- 6- 

FRDI Bill: बेहाल बैंकों की इक्विटी की औकात क्या होगी

वित्त मंत्री अरुण जेटली कह तो रहे हैं कि हमारे हितों की रक्षा की जाएगी; लेकिन यह बता ही नहीं रहे कि कैसे करेंगे रक्षा? एफडीआरआई बिल में बैंक की हालत के पतली होने की हालत में जिन लोगों की रकम सुरक्षित रखी जाएगी, उनकी लिस्ट बनी है। इस लिस्ट में बैंकों में जिनकी रकम का बीमा नहीं होता, वो पांचवे नंबर पर हैं। सरकार का दावा है कि उनकी रकम खत्म तो नहीं होगी, मगर उनकी रकम को इक्विटी में बदल दिया जाएगा।

कुल मिलाकर ऐसा माना जा रहा है कि बैंक जब नाजुक हालत में होंगे तब इस बिल के तहत वो हमारे जमा पैसे से अपना सारा घाटा पूरा कर लेंगे। और फिर इसी बिल से एक सुरंग और निकल रही है। ये सुरंग सार्वजनिक क्षेत्र के सारे बैंकों के प्राइवेट बाजार में निकल रही है। वैसे हमारी जिस रकम को इक्विटी में बदलकर बचाने का दावा सरकार कर रही है, वो दावा भी तकरीबन खोखला ही है।

जब बैंकों की हालत खराब होगी और हमारी जमा को इक्विटी में बदला जाएगा, तब इक्विटी की भी वैल्यू अपने आप कम हो जाएगी। इसलिए बैंकों में जितना पैसा हमारा जमा होगा, उसकी भी वैल्यू कम हो जाएगी। यानि घाटा होना तय है। इसके अलावा हमें अगर अपना पैसा चाहिए होगा तो इस इक्विटी को निजी कंपनियों को बेचना ही पड़ेगा। और अगर बैंक अपनी इक्विटी निजी कंपनियों को बेचते हैं तो जानते हैं क्या होगा? फिर बैंकों की मालिक निजी कंपनियां होंगी। फिर सारे बैंक प्राइवेट होंगे। यानि कि इस बिल में चाहे कोई सरकारी टीम काम करे या प्राइवेट, होना यही है कि बैंक निजी कंपनियों के हाथ कौड़ियों के मोल बिकने हैं। और इस काम के लिए संसद से भी न तो पूछा जाएगा और न ही बताया जाएगा। सीधे कार्यपालिका ही बैंकों को बेभाव लुटा सकेगी।
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी

पार्ट- 1- 

FRDI Bill: मजा मारें गाजी मियां, धक्का सहें डफाली

वैसे इतना महीन बिल मोदी जी के करामाती और फोटोशॉप से भी तेज दिमाग से नहीं निकला है। दस साल पहले सन दो हजार आठ में जब दुनिया में मंदी आई थी, तब फाइनेंशियल स्टैबिलिटी बोर्ड बना था। ये बिल उसी की सिफारिशों पर बना है। ताकि यह पक्का हो सके कि भविष्य में ऐसे संकटों में जब भी वित्तीय प्रणाली फंसे तो उसके लिए अलग से बजट न रखा जाए। उस वक्त अमेरिका ने भी यही किया था और वहां लोग सबसे ज्यादा तबाह हुए थे। भारत जी-20 देशों में से एक था, जिसने इस बोर्ड की सिफारिशों को स्वीकार किया था। एफआरडीआई विधेयक इसी का नतीजा है।

लेकिन हम जैसे टैक्स देने वालों से मिले पैसे से किसी निजी कंपनी या इंस्टीट्यूट को बचाने और सरकारी इंस्टीट्यूट को बचाने के बीच एक बहुत बड़ा फर्क है। एक में कोई वैधता नहीं है तो दूसरे में वैधता है। असल में सरकार बैंकों को खुद ही इस तरह की जहरीली और नुकसानदेह परिसंपत्तियों से दबने से रोक सकती है, जिससे हम टैक्स देने वालों के पैसे से बैंकों के बचाए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होना चाहिए। और निश्चित रूप से जैसा अमेरिका में हुआ, उतने बड़े पैमाने पर तो बिलकुल नहीं पैदा होना चाहिए।

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उस वक्त भी भारत में राष्ट्रीयकृत बैंकों की  ये जहरीली या हानिकारक परिसंपत्तियां इतनी कम थीं कि प्राइवेट सेक्टर के झंडाबरदारों को भी यह मानना पड़ा कि बैंक राष्ट्रीयकरण के कारण भारत बाकी दुनिया की तरह फंसा नहीं था, बल्कि हमारी हालत अच्छी थी। इसलिए, तरक्की के हिमालय पर बैठे पूंजीवादी देशों के इस आइडिया को अपने यहां भारत में अपनाने का विचार बेतुका है।
इस आइडिया में धन्ना सेठों को ढेर सारी ऐसी पूंजी मिल जाएगी जिसे बैंक हमारी जेब से वापस लेंगे। मतलब मजा मारें गाजी मियां, धक्का सहें डफाली। और इकॉनामी और उससे जुड़े मामलों में हमारी मोदी सरकार तो पहले ही कितनी समझदार है, पिछले तीन सालों से हम देख ही रहे हैं। ऐसे में ये नए नए पंडितों के बताए रास्ते पर अंधी होकर चल रही है और न डफाली को देख पा रही है और न ही धक्के को।
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी

पार्ट- 1- 

नोटबंदी और एफआरडीआई बिल में कंपनियों की खुली लूट

मगर अब ये दीवार दरक जाएगी। ये भरोसा कमजोर हो जाएगा। नोटबंदी ने कागज के इन नोटों पर से हमारा भरोसा पहले ही हटा दिया था। मोदी जी ने वादा भी किया था कि ऐसे झटके तो लगते रहेंगे। गनीमत रही कि नोटबंदी में पैसों का नुकसान नहीं हुआ। बस हमें लंबी लंबी लाइनें लगानी पड़ीं, थोड़ा रोना पड़ा, थोड़ा लड़ना पड़ा और पैसे न मिलने पर ढेर सारा कुढ़ना पड़ा। शादी ब्याह कर रहे थे या मकान बनवा रहे थे, सब रुक गया, सब थम गया। और बची रह गई कुढ़न।

जैसे हाथ में रखे पैसे पर से भरोसा टूटा, वैसे ही बैंक में रखा पैसा, यानि कि रकम बहुत दिन तक सेफ असेट नहीं रहने वाली। एफआरडीआई बिल में सरकार की सारी बीमा और दूसरी वित्तीय कंपनियां शामिल हैं। इसलिए इस बिल के बाद जैसे बैंक डिपॉजिट में हमारा भरोसा नहीं रह जाएगा, वैसे ही बीमा और इन्वेस्टमेंट के दूसरे सारे तरीकों पर से हमारा भरोसा उठ जाएगा।
क्योंकि जमा तो कहीं भी करें, हमारा कुछ भी जमा सेफ होने की कोई सरकारी गारंटी नहीं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां लोगों को न पैसे का भरोसा हो, न बैंक पर यकीन हो और न ही किसी दूसरे तरह की जमाओं पर विश्वास हो, उसका क्या हाल होने वाला है, ये बात बुद्धि में आ रही है या नहीं? फिर पैसे कैसे बचाएंगे? फिर तो सबसे सेफ होगा सोना, जमीन या हीरे, जवाहरात, अशरफियां। बिटकॉइन? नहीं, अब तो उसपर भी इनकमटैक्स वाले लग गए। रखेंगे कैसे? जैसे हमारे परदादा और लकड़दादा रखते आए हैं। डिजिटल इकॉनमी की ऐज में मोदी सरकार हमें भगवान राम के युग में लेकर जा रही है। रामराज आ रहा है।  सब राम जी का है ना?
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी



पार्ट- 1- 

एफआरडीआई बैंकों का भरोसा तोड़ देगा

अभी क्या है कि अकाउंट में एक लाख रुपये तक जमा होते हैं तो उनका पूरा इंश्योरेंस होता है। बैंक डूब जाए, भाग जाए, लुट जाए, जल जाए, तो भी हमारा पैसा सेफ रहता है।
ये इंश्योरेंस एलआईसी नहीं करती है। इसके लिए बाकायदा डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन है। ये रिजर्व बैंक की सहायक कंपनी है। इस बिल में इसे बंद कर देंगे और इसकी जगह इसके जैसा कोई दूसरा कॉरपोरेशन नहीं खोला जाएगा।
लेकिन इससे भी जरूरी बात तो ये है कि बैंकों पर हमारे भरोसे की वजह सिर्फ ये कॉरपोरेशन ही नहीं था। हमें भरोसा इसलिए भी था कि हमारी सरकार बैंकों की मालिक है और अगर कभी ये बैंक फेल हुए तो कम से कम वो तो इनके पीछे खड़ी है।

यह वही विश्वास है, वही यकीन है जिसकी वजह से हमारे आप जैसे लाखों लोग जाने कैसे और किन जरूरतों को सोचकर बैंकों में पैसा जमा करते रहे हैं। और इस जमा के बदले में हमें जो ब्याज मिलता है, वो तो डिपाजिट शेयर, म्यूचुअल फंड और कई तरीकों के हिसाब से बहुत कम होता है। मगर भरोसा तो होता है।
अब ये भरोसा, हमारा ये यकीन खत्म हो जाएगा। पहले जब लोग बैंकों पर भरोसा नहीं करते थे तो वो जाने कहां कहां अपना पैसा छुपाकर रखते थे। बक्सों में, जमीन के अंदर, पुराने तहखानों में या दीवार के पीछे।
लोग मानते थे कि बैंक नाम की जो चीज है, उसकी अपनी कोई गुडविल नहीं है और वो कुछ  अज्ञात किस्म के निजी ऑपरेटर चलाते हैं। लेकिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने इस तरह की सोच बदल डाली। हममें भरोसा जागा कि अब तो सब बैंक सरकार के हैं और सरकार हमारा पैसा लेकर कहां जाएगी। वापस तो करेगी ही।
जारी
Story- Pro. Prabhat Patnayak



पार्ट- 1- 

Saturday, July 7, 2012

ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही हो सकता है...


ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही हो सकता है...भारत के लिये पदक लाने वाली ख्रिलाडी पर पुरुष होने का आरोप लगाया जाता है और वो महिला है या पुरुष, ये जाने बगैर उसे उन वहशी दरिन्दो के साथ बन्द कर दिया जाता है, जो पहले से ही पगलाये, इन्सानी गोश्त के बेरहम तलब्रगार है....क्या इसी दिन के लिये पिन्की ने दिन रात एक कर दिया था?? हे मेरे कानून....खिलाडी होने का वेटेज तो सब जगह होता है....कम से कम इसका तो ध्यान रखा. कम से कम पुलिस को तो इस तरह पिन्की के सीने पर हाथ डालने से पहले सोचना था.....दोस्तो...खेल भावना के साथ...इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे... — with Rajiv Taneja and 37 others.
 ·  ·  · Yesterday at 1:03am ·