मौलाना दे साथ,
तो हो गया समाजवाद,
मौलाना छोडें साथ,
तो भी हो गया समाजवाद,
यादवों की बाल्टी का हाथ,
बढाए समाजवाद,
अमिताभ के ठुमकों का राज,
बताता है समाज वाद,
डिम्पल के डिम्पल का आगाज ,
मर गया समाजवाद,
अमर होकर डूबता जहाज,
वाह वाह समाजवाद,
मुलायम मुलायम वंशवाद,
जाने कहाँ से आ गया ये समाजवाद,
लोहिया के बज कर ख़त्म हुए सारे साज,
अहा अहा समाज वाद
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Friday, November 13, 2009
Friday, November 6, 2009
आज मे बीतता हुआ कल- प्रभाष जोशी
उन्हें युगपुरुष कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी। एक बार उन्होंने ही कहा था कि अखबार कल का इतिहास बनाता है। बीते हुए कल का। उनकी ये बात कोई नई नही है। अखबार का चरित्र ही कुछ ऐसा है। लेकिन अखबार का एक और
चरित्र होता है। एक अनोखा रूप, रंग, भाषा, संवाद शैली और निष्पक्षता। ये अखबार का सम्पादक बनाता है। ये काम प्रभाष जी ने किया और क्या खूब किया। उन्होंने नई दुनिया मे काम किया, मध्य प्रदेश के एक और अखबार मे काम किया लेकिन उनकी सारी यादें जनसत्ता मे ही सिमट कर रह जाती है। जनसत्ता से इतर जो यादे हैं, वो एक ऐसे अभिवावक की, जिसपर भरोसा रहा, हमेशा भरोसा रहा कि जब भी किसी पत्रकार के साथ कुछ हुआ या होगा, वो साथ रहेंगे। शारीरिक रूप से नही तो कलम से, माइक से या किसी भी तरह से। उनके रहने से डर नही लगता था। उनके चले जाने के बाद अब यह डर एक आत्मविश्वास मे बदलने लगा है कि वो ऐसा कर सकते थे तो हम क्यों नही। लेकिन ये आत्मविश्वास भी बगैर उनके खोखला है, सूना है। वो कल थे जो हमेशा आज के साथ बीतते थे। आने वाले कल मे भी उनका ही साया रहता था और साथ मे इंतज़ार- कि कल क्या होगा। पिछले दस से ज्यादा सालों मे, जबसे मैंने उन्हें पढ़ना-गुनना शुरू किया, हमेशा मन मे यही उत्कंठा रहती थी, न जाने कब मैं इस शख्स से मिल पाउँगा। उनके घर के इतने पास रहते हुए भी मैं कभी मिलने नही जा पाया। और शायद यही कारण है कि उनकी मौत की ख़बर सुनकर भी मैं जान बूझकर उनके घर नही गया। मुझसे ये सबकुछ बिल्कुल भी बर्दाश्त नही हो रहा था। क्योंकि ख़ुद उनका कहा आज बेमानी साबित हो रहा है। उनकी मौत पूरी तरह से बेमानी है। जो नही होनी चाहिए थी। लेकिन मौत को जस्टिफाई नही किया जा सकता। ये बात मैं जानता हूँ। फ़िर ये मन मानने को तैयार क्यों नही होता कि वो आज बीते हुए कल हो गए हैं। नही.....ऐसा नही हो सकता। गुरूजी हमेशा हैं और रहेंगे। जैसे पिछले दस सालों से मेरे साथ हैं, वैसे ही आगे भी रहेंगे.....
चरित्र होता है। एक अनोखा रूप, रंग, भाषा, संवाद शैली और निष्पक्षता। ये अखबार का सम्पादक बनाता है। ये काम प्रभाष जी ने किया और क्या खूब किया। उन्होंने नई दुनिया मे काम किया, मध्य प्रदेश के एक और अखबार मे काम किया लेकिन उनकी सारी यादें जनसत्ता मे ही सिमट कर रह जाती है। जनसत्ता से इतर जो यादे हैं, वो एक ऐसे अभिवावक की, जिसपर भरोसा रहा, हमेशा भरोसा रहा कि जब भी किसी पत्रकार के साथ कुछ हुआ या होगा, वो साथ रहेंगे। शारीरिक रूप से नही तो कलम से, माइक से या किसी भी तरह से। उनके रहने से डर नही लगता था। उनके चले जाने के बाद अब यह डर एक आत्मविश्वास मे बदलने लगा है कि वो ऐसा कर सकते थे तो हम क्यों नही। लेकिन ये आत्मविश्वास भी बगैर उनके खोखला है, सूना है। वो कल थे जो हमेशा आज के साथ बीतते थे। आने वाले कल मे भी उनका ही साया रहता था और साथ मे इंतज़ार- कि कल क्या होगा। पिछले दस से ज्यादा सालों मे, जबसे मैंने उन्हें पढ़ना-गुनना शुरू किया, हमेशा मन मे यही उत्कंठा रहती थी, न जाने कब मैं इस शख्स से मिल पाउँगा। उनके घर के इतने पास रहते हुए भी मैं कभी मिलने नही जा पाया। और शायद यही कारण है कि उनकी मौत की ख़बर सुनकर भी मैं जान बूझकर उनके घर नही गया। मुझसे ये सबकुछ बिल्कुल भी बर्दाश्त नही हो रहा था। क्योंकि ख़ुद उनका कहा आज बेमानी साबित हो रहा है। उनकी मौत पूरी तरह से बेमानी है। जो नही होनी चाहिए थी। लेकिन मौत को जस्टिफाई नही किया जा सकता। ये बात मैं जानता हूँ। फ़िर ये मन मानने को तैयार क्यों नही होता कि वो आज बीते हुए कल हो गए हैं। नही.....ऐसा नही हो सकता। गुरूजी हमेशा हैं और रहेंगे। जैसे पिछले दस सालों से मेरे साथ हैं, वैसे ही आगे भी रहेंगे.....
Saturday, September 26, 2009
मेरा नाम जोकर
नही। ये कोई फ़िल्म नही और न ही फ़िल्म याद करने की कोशिश है। ये तो बस समाज मे उन विदूषकों को तलाशने, उन्हें याद करने की कोशिश है। जोकर शब्द से अक्सर लोगों को याद आता है कुछ अजीब सी पोशाक पहनकर अजीब
अजीब सी हरकतें करना। लोगों को हसना, उन्हें हसने के लिए प्रेरित करना। कामेडी फिल्मो की तरह नही, असल जिंदगी मे। दरअसल कितने ही लोग होंगे जो जोकर को अभी तक ठीक से समझ नही पाये। ख़ुद मैं भी अभी पूरी तरह से जोकर को नही समझ पाया हु। ताश का तिर्पनवा पत्ता, जिसे कभी भी कही भी यूज कर सकते हैं और वो बेचारा खुशी खुशी तैयार भी रहता है। लेकिन यही जोकर बाजी इधर की उधर कर देता है। असल जिंदगी मे भी यही होता है। जब भी हम उदास होते हैं तो हमें कुछ तलाश होती है। उस तलाश को पूरा करने के लिए हमेशा विदूषक ही काम आता है। अब उसके रूप कई हो सकते हैं। कभी वह हमारा ही पड़ोसी हो सकता है तो कभी रिक्शे वाला । यहाँ तक कि पानी की लाइन मे लगी प्लास्टिक की बाल्टी लिए वह महिला भी हो सकती है जिसे धकेल कर हम पहले पानी भरना चाहते हैं। हम ख़ुद भी अपने जोकर हो सकते हैं। सवाल है कि जोकर की इस जिंदगी मे जरूरत क्यों। जाहिर है कि जवाब के लिए अभी से नही बल्कि काफ़ी पीछे जाना पड़ेगा। इसका संबंध सिर्फ़ खुश होने भर से नही है। जोकर के मानवीय संबंधो के अध्ययन मे मैंने पाया कि जोकर की उपस्थिति प्रागैतिहासिक काल से ही रही है। कबीलाई समाज मे भी एक विदूषक होता था। वो कबीले के रजा को हँसी खेल मे ही शासन सत्ता की राय देता था और उस वक्त के रजा उसके मजाक को हँसी के साथ सुनते थे और उसे गंभीरता से लेते थे। मुगलकाल मे बीरबल विदूषक थे और उनके किस्से आज भी मशहूर हैं। आज भी मशहूर है कि कैसे बीरबल ने रजा को हँसी हँसी मे ही गंभीर बातो को सुलझाने की अक्ल दी। प्राचीन रजा विदूषक के अहमियत को समझते थे। ग्लोब्लाइज़ेशन के इस दौर मे, जहाँ तक मैं समझता हूँ, अब आधी से ज्यादा आबादी जबरदस्ती प्रजा बन चुकी है या बने जा चुकी है और चौथाई आबादी ख़ुद को राजा समझती है। लेकिन ये राजा अभी तक अपने विदूषक नही खोज पाए हैं। इन्हे उनकी तलाश ही नही है क्योंकि इनकी कोई प्रजा ही नही है। जो प्रजा है भी, वह तो इन्हे राजा के ओहदे पर मान रही है और ऐसा भी इस्ल्ये क्योंकि भारतीय जनमानस अभी तक ख़ुद को प्रजा की मानसिकता से बाहर नही निकल पाया है । ऐसे मे विदूषक ख़त्म होते जा रहे हैं, जोकरों का कही भी कोई नामलेवा नही है। हाँ, कभी कभी दिल्ली मे होने वाले नाटको मे कुछ विदूषक जरूर दिख जाते हैं लेकिन वह भी वही तक सीमित रहते हैं। समाज से विदूषक गायब होते जा रहे हैं। सवाल है, विदूषकों के बगैर कैसा समाज?
अजीब सी हरकतें करना। लोगों को हसना, उन्हें हसने के लिए प्रेरित करना। कामेडी फिल्मो की तरह नही, असल जिंदगी मे। दरअसल कितने ही लोग होंगे जो जोकर को अभी तक ठीक से समझ नही पाये। ख़ुद मैं भी अभी पूरी तरह से जोकर को नही समझ पाया हु। ताश का तिर्पनवा पत्ता, जिसे कभी भी कही भी यूज कर सकते हैं और वो बेचारा खुशी खुशी तैयार भी रहता है। लेकिन यही जोकर बाजी इधर की उधर कर देता है। असल जिंदगी मे भी यही होता है। जब भी हम उदास होते हैं तो हमें कुछ तलाश होती है। उस तलाश को पूरा करने के लिए हमेशा विदूषक ही काम आता है। अब उसके रूप कई हो सकते हैं। कभी वह हमारा ही पड़ोसी हो सकता है तो कभी रिक्शे वाला । यहाँ तक कि पानी की लाइन मे लगी प्लास्टिक की बाल्टी लिए वह महिला भी हो सकती है जिसे धकेल कर हम पहले पानी भरना चाहते हैं। हम ख़ुद भी अपने जोकर हो सकते हैं। सवाल है कि जोकर की इस जिंदगी मे जरूरत क्यों। जाहिर है कि जवाब के लिए अभी से नही बल्कि काफ़ी पीछे जाना पड़ेगा। इसका संबंध सिर्फ़ खुश होने भर से नही है। जोकर के मानवीय संबंधो के अध्ययन मे मैंने पाया कि जोकर की उपस्थिति प्रागैतिहासिक काल से ही रही है। कबीलाई समाज मे भी एक विदूषक होता था। वो कबीले के रजा को हँसी खेल मे ही शासन सत्ता की राय देता था और उस वक्त के रजा उसके मजाक को हँसी के साथ सुनते थे और उसे गंभीरता से लेते थे। मुगलकाल मे बीरबल विदूषक थे और उनके किस्से आज भी मशहूर हैं। आज भी मशहूर है कि कैसे बीरबल ने रजा को हँसी हँसी मे ही गंभीर बातो को सुलझाने की अक्ल दी। प्राचीन रजा विदूषक के अहमियत को समझते थे। ग्लोब्लाइज़ेशन के इस दौर मे, जहाँ तक मैं समझता हूँ, अब आधी से ज्यादा आबादी जबरदस्ती प्रजा बन चुकी है या बने जा चुकी है और चौथाई आबादी ख़ुद को राजा समझती है। लेकिन ये राजा अभी तक अपने विदूषक नही खोज पाए हैं। इन्हे उनकी तलाश ही नही है क्योंकि इनकी कोई प्रजा ही नही है। जो प्रजा है भी, वह तो इन्हे राजा के ओहदे पर मान रही है और ऐसा भी इस्ल्ये क्योंकि भारतीय जनमानस अभी तक ख़ुद को प्रजा की मानसिकता से बाहर नही निकल पाया है । ऐसे मे विदूषक ख़त्म होते जा रहे हैं, जोकरों का कही भी कोई नामलेवा नही है। हाँ, कभी कभी दिल्ली मे होने वाले नाटको मे कुछ विदूषक जरूर दिख जाते हैं लेकिन वह भी वही तक सीमित रहते हैं। समाज से विदूषक गायब होते जा रहे हैं। सवाल है, विदूषकों के बगैर कैसा समाज?
Sunday, August 23, 2009
कैसे कैसे लोग.....
दुनिया भर की कलाबाजियों से अघाये, नहाये लोगों को सिर्फ़ नाक मे ऊँगली डालकर सबसे ज्यादा मजा आता है दूसरों की खबरों मे। रस ले लेकर उसे नाक से निकले रस मे डुबोकर रसहीन बनने मे रस आता है उनको। कौन क्या कर रहा है और करने से पहले उन्हें ख़ुद को जानने की आदमी इच्छा मे ही डूबकर मर जाने की उनकी चाहत न जाने कम होगी। कम होगी भी या नही, ये तो उनका मन जानता है, या फ़िर उन्हें इंतज़ार है किसी ऐसे क्षण का, जिसमे सारे रस एक मे ही डूबकर आपस मे मिल जायें। सड़क पर चलते हुए उसी सड़क पर बार बार शीशे मे अक्स निहारती वो पागल लड़की नही दिखाई देगी उनको, उसके धूल और मिटटी से सने बालों से कोई परेशानी नही होगी उनकी, और तो और अपने कोयला हो चुके और आदमजात रंग पे भी बोलने वालों से कोई परेशानी नही होगी उनको, अगर होगी तो सिर्फ़ इससे की वो क्यों है, सवाल उसके होने पे है, उसके न होने से उनके सारे सवाल भी मरने लगते हैं। इन अघाए लोगों का कोई इलाज है क्या?
Saturday, August 22, 2009
खुश होने के बहाने....
खुशी भी कई तरह की होती है। हँसी भी कई तरह की होती है। बीड़ी जलाकर चार गाल बतियाते रिक्शे वालों मे जो ठहाका लगता है, उसे हँसी कहें या खुशी, आसानी से समझ नही आता। जरूरी नही की खुशी का सीधा सम्बन्ध सुख से ही हो। सुखी लोग भी अक्सर दुखी रहते हैं। अब घर के बगल वाली आंटी को ही ले लीजिये। छोटे बेटे की जब तक शादी नही हुई थी, तब तक उसकी शादी के लिए दुखी, शादी हो गई और बहु घर आने के दूसरे महीने मे ही गर्भवती हो गई तो अब उसका दुःख। लेकिन मोहल्लेवाले मानते हैं की आंटी खुश रहती हैं।
लेकिन कहाँ? जब वो दुकान पर बैठती हैं, मोहल्ले के चार लोग उनसे नमस्ते करते हैं और खासकर तब, जब उनसे उनकी बहू का हालचाल पूछ लिया जाय। खुश होते हुए भी वह अपनी दुःख भरी आपबीती सुनती हैं। लेकिन उनके खुश रहने का यही तरीका है। रोज सुबह दिल्ली और एन सी आर की तरफ़ आस पास के तीस कोस से हजारो मजदूर काम करने आते हैं। उनकी कमाई का बस एक ही जरिया होता है कि जिस दिन वो आयें, उस दिन उन्हें दिन भर का कोई काम मिल जाए। ताकि शाम को उनके घर का चूल्हा जल सके। लेकिन मजाल है की उनके चेहरों से दुःख की एक बूँद भी टपक जाए। ट्रेन मे बैठे हैं तो ताश की बाजी पे ठहाका लग रहा है और काम की तलाश मे चौराहे पे खड़े हैं तो बीडी के धुएँ मे ठहाके लगाते उनके पीले दांत उनकी खुशी को साफ़ साफ़ टपकाते जाते हैं। इस तरह से देखा जाए तो सभी खुश हैं। तो फ़िर दुःख क्या है और पूरी दुनिया खुशी की तलाश मे इधर से उधर क्यों भाग रही है। आख़िर लोग किस सच्ची खुशी की बात करते हैं? किस खुशी को खोजने पहाडों पे चले जाते हैं या एकांतवास धारण कर लेते हैं। इधर उधर बिखरी पड़ी हँसी को समेट जाए तो खुशी का भरा पूरा जिन्न बन जाता है। चिराग रगड़ा और खुशी का जिन्न बाहर। लो, हंस लो अब, हो लो खुश जितना भी हो। दरअसल जिस स्पीड से हम आगे बढ़ने और अर्थ पर डिपेंड होने के दौड़ लगा रहे हैं, आस पास की चीजों को भूलते जा रहे हैं। मेरठ मे मेरे एक दोस्त हैं। आजकल वो सामाजिक होने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक होने के लिए क्लास अटैंड कर रहे हैं। उस क्लास मे सामाजिकता मे खुश कैसे रहें, ये सिखाया जाता है। उनका कहना है की हम दुखी सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि हम सामाजिकता भूल चुके हैं, हमने प्राचीन काल से जो समाज बनाया था, उसके जो नॉर्म्स बनाये थे, अब ख़ुद ही उसे तोड़ रहे हैं। इस टूटन मे हम किस हद तक टूट चुके हैं और टूटे जा रहे हैं, ये हम अभी तो नही जान पाएंगे, लेकिन हमारे अकेले पड़ गए बच्चों के चेहरों पर इसकी टूटन साफ़ देखी जा सकती है। इसलिए खुशी की तलाश बहुत जरूरी है। लेकिन बात फ़िर से वही पर आकर अटक जाती है। खुशी की तलाश आख़िर क्यों? हम यूँ ही क्यों नही खुश रह सकते?
लेकिन कहाँ? जब वो दुकान पर बैठती हैं, मोहल्ले के चार लोग उनसे नमस्ते करते हैं और खासकर तब, जब उनसे उनकी बहू का हालचाल पूछ लिया जाय। खुश होते हुए भी वह अपनी दुःख भरी आपबीती सुनती हैं। लेकिन उनके खुश रहने का यही तरीका है। रोज सुबह दिल्ली और एन सी आर की तरफ़ आस पास के तीस कोस से हजारो मजदूर काम करने आते हैं। उनकी कमाई का बस एक ही जरिया होता है कि जिस दिन वो आयें, उस दिन उन्हें दिन भर का कोई काम मिल जाए। ताकि शाम को उनके घर का चूल्हा जल सके। लेकिन मजाल है की उनके चेहरों से दुःख की एक बूँद भी टपक जाए। ट्रेन मे बैठे हैं तो ताश की बाजी पे ठहाका लग रहा है और काम की तलाश मे चौराहे पे खड़े हैं तो बीडी के धुएँ मे ठहाके लगाते उनके पीले दांत उनकी खुशी को साफ़ साफ़ टपकाते जाते हैं। इस तरह से देखा जाए तो सभी खुश हैं। तो फ़िर दुःख क्या है और पूरी दुनिया खुशी की तलाश मे इधर से उधर क्यों भाग रही है। आख़िर लोग किस सच्ची खुशी की बात करते हैं? किस खुशी को खोजने पहाडों पे चले जाते हैं या एकांतवास धारण कर लेते हैं। इधर उधर बिखरी पड़ी हँसी को समेट जाए तो खुशी का भरा पूरा जिन्न बन जाता है। चिराग रगड़ा और खुशी का जिन्न बाहर। लो, हंस लो अब, हो लो खुश जितना भी हो। दरअसल जिस स्पीड से हम आगे बढ़ने और अर्थ पर डिपेंड होने के दौड़ लगा रहे हैं, आस पास की चीजों को भूलते जा रहे हैं। मेरठ मे मेरे एक दोस्त हैं। आजकल वो सामाजिक होने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक होने के लिए क्लास अटैंड कर रहे हैं। उस क्लास मे सामाजिकता मे खुश कैसे रहें, ये सिखाया जाता है। उनका कहना है की हम दुखी सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि हम सामाजिकता भूल चुके हैं, हमने प्राचीन काल से जो समाज बनाया था, उसके जो नॉर्म्स बनाये थे, अब ख़ुद ही उसे तोड़ रहे हैं। इस टूटन मे हम किस हद तक टूट चुके हैं और टूटे जा रहे हैं, ये हम अभी तो नही जान पाएंगे, लेकिन हमारे अकेले पड़ गए बच्चों के चेहरों पर इसकी टूटन साफ़ देखी जा सकती है। इसलिए खुशी की तलाश बहुत जरूरी है। लेकिन बात फ़िर से वही पर आकर अटक जाती है। खुशी की तलाश आख़िर क्यों? हम यूँ ही क्यों नही खुश रह सकते?
Friday, August 14, 2009
मोहल्ले की सुध नही और देश से प्यार है???
गजब के लोग हैं। उन्हें उत्सव का बहाना चाहिए। और ये शायद जिस तरह की अर्थ व्यवस्था इस वक्त चल रही है, उसी के परिणाम हैं। कि हर चीज मे उत्सव
खोजने की आदत सी हो गई है। आज जिसे देखो, वही कहता नजर आ रहा है, मेरा देश....मेरा वतन। मेरी तो आज तक समझ मे ही नही आया की कैसा देश? कैसा वतन? मोहल्ले की सुध नही और चले हैं देश से प्यार करने। पड़ोसी का अता पता नही और बात करते हैं पाकिस्तान की। ख़ुद कभी नौकरी के झंझटों से आजाद नही हो पाए, जो मन चाहा , वो कभी नही कर पाए, बात करते हैं आजादी की। सचमुच गजब के लोग हैं। शायद यही अजीब चीजें बाहर के लोगों को भारत की तरफ़ खींचती हैं। मोहल्ले की नाली मे सूअर डुबकियां लगा रहा है , उससे लाख बीमारियाँ हो रही हैं, लेकिन चवन्नी के लिए ऑटो वाले से झगडा कर लेंगे। घर के बाहर लोग कूड़ा फेंकेंगे, लेकिन बजे उसकी नगर पालिका मे शिकायत करने के कूड़ा फेंकने वाले से फौजदारी पे उतर आएंगे। ख़ुद ही ट्रेन मे आग लगायेंगे और मारेंगे मुसलमानों को। ख़ुद ही अपने धर्मगुरु की हत्या करेंगे और इज्ज़त लूटेंगे इसाई महिलाओं की। गजब के लोग हैं। फ़िर कहेंगे कि देश से प्यार है। बिहार से दिल्ली मे लाकर १२-१२ साल की लड़कियों को १०-१० हजार लेकर घरों मे काम करने को सप्लाई करेंगे, और कहेंगे कि हम आजाद हैं। आजाद!!! माई फुट!!
खोजने की आदत सी हो गई है। आज जिसे देखो, वही कहता नजर आ रहा है, मेरा देश....मेरा वतन। मेरी तो आज तक समझ मे ही नही आया की कैसा देश? कैसा वतन? मोहल्ले की सुध नही और चले हैं देश से प्यार करने। पड़ोसी का अता पता नही और बात करते हैं पाकिस्तान की। ख़ुद कभी नौकरी के झंझटों से आजाद नही हो पाए, जो मन चाहा , वो कभी नही कर पाए, बात करते हैं आजादी की। सचमुच गजब के लोग हैं। शायद यही अजीब चीजें बाहर के लोगों को भारत की तरफ़ खींचती हैं। मोहल्ले की नाली मे सूअर डुबकियां लगा रहा है , उससे लाख बीमारियाँ हो रही हैं, लेकिन चवन्नी के लिए ऑटो वाले से झगडा कर लेंगे। घर के बाहर लोग कूड़ा फेंकेंगे, लेकिन बजे उसकी नगर पालिका मे शिकायत करने के कूड़ा फेंकने वाले से फौजदारी पे उतर आएंगे। ख़ुद ही ट्रेन मे आग लगायेंगे और मारेंगे मुसलमानों को। ख़ुद ही अपने धर्मगुरु की हत्या करेंगे और इज्ज़त लूटेंगे इसाई महिलाओं की। गजब के लोग हैं। फ़िर कहेंगे कि देश से प्यार है। बिहार से दिल्ली मे लाकर १२-१२ साल की लड़कियों को १०-१० हजार लेकर घरों मे काम करने को सप्लाई करेंगे, और कहेंगे कि हम आजाद हैं। आजाद!!! माई फुट!!
Wednesday, August 12, 2009
हर आदमी मे होते हैं दस बीस आदमी...
मुझे शब्द तो याद रहते हैं, लाइने भी याद रहती हैं, लेकिन किसने लिखे, ये नही याद रह पता। इस मामले मे मैं बड़ा कमजोर हूँ। अब जैसे कि यही - "हर आदमी मे होते हैं दस बीस आदमी..." बात सही है और तकरीबन हर मौके की
है। अब एकांतवास जैसी चीजें मन को सिर्फ़ एक धोखा सा देने भर को रह गई हैं। लोग इतने ज्यादा हो गए हैं कि हर जगह मिल ही जाते हैं। शब्द बहुत ज्यादा बढे तो नही हैं, लेकिन जितने भी हैं, परेशान करने के लिए काफ़ी रहते हैं। और हर आदमी शब्दों का प्रयोग खूब करता है, मन भरकर करता है। इस पर भी अगर हर आदमी मे दस बीस आदमी हो जायें तो फ़िर तो इन्ही गिने चुने शब्दों की बाढ़ सी आ जाती है। मेरे पास कोई बहुत ज्यादा शब्द नही हैं, लेकिन उन लोगों के शब्दों की संख्या गिन गिन कर खुन्नाया रहता हूँ। मैं मानता हूँ कि मेरे अन्दर मे कुछ और लोग रहते हैं, वो लालची हैं, मौकापरस्त हैं और भी कई अजीब अजीब से लोग हैं। ये लोग वक्त वक्त पे सामने आते रहते हैं। लेकिन आजकाल जो लोग मुझसे मिल रहे हैं, वो तो कमाल के हैं। बैठे ठाले अचानक अध्यात्म की बाते करेंगे और वही बातें करते करते उनका अध्यात्म कैसे ध्न्यात्म (धन ) तक पहुच जाता है, जब तक मेरी समझ मे आता है, वो अपना काम कर चुके होते हैं। ऐसे ही अचानक प्रेम भरी बातें करते करते किस तरह से दुश्मनाई पे पहुच जायेंगे कि लगेगा ही नही अभी अभी कुछ देर पहले प्रेम रस की गंगा बह रही थी। मतलब कोई भी कभी भी अपनी बात पे कायम नही रह सकता। कक्षा एक से लेकर छठीं कक्षा तक मैंने यही पढ़ा कि कैसे आदमी को अपनी कही हुई बातों पे कायम रहना चाहिए। इस खोज मे कि अभी भी वही पढाया जा रहा है, मैंने उन्ही कक्षाओं की किताबें फ़िर से पलटी। अभी भी वही पढाया जा रहा है। तो आख़िर क्या बात है कि हर आदमी मे मुझे एक लम्पट नजर आने लगा है। आखिर वो कौन सी चीजें है जो आदमी को इस कदर बिगाड़ देती हैं कि अच्छा भला बच्चा भी लम्पटपने पर उतर आता है....
है। अब एकांतवास जैसी चीजें मन को सिर्फ़ एक धोखा सा देने भर को रह गई हैं। लोग इतने ज्यादा हो गए हैं कि हर जगह मिल ही जाते हैं। शब्द बहुत ज्यादा बढे तो नही हैं, लेकिन जितने भी हैं, परेशान करने के लिए काफ़ी रहते हैं। और हर आदमी शब्दों का प्रयोग खूब करता है, मन भरकर करता है। इस पर भी अगर हर आदमी मे दस बीस आदमी हो जायें तो फ़िर तो इन्ही गिने चुने शब्दों की बाढ़ सी आ जाती है। मेरे पास कोई बहुत ज्यादा शब्द नही हैं, लेकिन उन लोगों के शब्दों की संख्या गिन गिन कर खुन्नाया रहता हूँ। मैं मानता हूँ कि मेरे अन्दर मे कुछ और लोग रहते हैं, वो लालची हैं, मौकापरस्त हैं और भी कई अजीब अजीब से लोग हैं। ये लोग वक्त वक्त पे सामने आते रहते हैं। लेकिन आजकाल जो लोग मुझसे मिल रहे हैं, वो तो कमाल के हैं। बैठे ठाले अचानक अध्यात्म की बाते करेंगे और वही बातें करते करते उनका अध्यात्म कैसे ध्न्यात्म (धन ) तक पहुच जाता है, जब तक मेरी समझ मे आता है, वो अपना काम कर चुके होते हैं। ऐसे ही अचानक प्रेम भरी बातें करते करते किस तरह से दुश्मनाई पे पहुच जायेंगे कि लगेगा ही नही अभी अभी कुछ देर पहले प्रेम रस की गंगा बह रही थी। मतलब कोई भी कभी भी अपनी बात पे कायम नही रह सकता। कक्षा एक से लेकर छठीं कक्षा तक मैंने यही पढ़ा कि कैसे आदमी को अपनी कही हुई बातों पे कायम रहना चाहिए। इस खोज मे कि अभी भी वही पढाया जा रहा है, मैंने उन्ही कक्षाओं की किताबें फ़िर से पलटी। अभी भी वही पढाया जा रहा है। तो आख़िर क्या बात है कि हर आदमी मे मुझे एक लम्पट नजर आने लगा है। आखिर वो कौन सी चीजें है जो आदमी को इस कदर बिगाड़ देती हैं कि अच्छा भला बच्चा भी लम्पटपने पर उतर आता है....
Tuesday, August 11, 2009
भूपेन याद हैं ?
भूपेन याद हैं आप सबको ? नही? जाहिर है कि ब्लॉग जगत मे पहली बार समानता का परचम लहराने वाले भूपेन और समानता की वकालत का नतीजा भुगत चुके भूपेन अपनी ब्लॉग जगत पर कम हलचल की वजह से शायद ब्लॉग जगत मे भुला दिए गए हों, लेकिन मैं नही भूल सकता। और जिसे करने मेमुझे अभी बार बार सोचना पड़ता है, उन्होंने कर के दिखा दिया। उनके बारे मे अक्सर लोग फोन पर या किसी और माध्यम पर मुझसे सवाल किया करते हैं। जैसे कि भूपेन आजकल कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं। दरअसल पिछले कई महीनों से वह काफी परशान चल रहे थे- नौकरी और जिन्गदी, दोनों से। उनके बारे मे याद है मुझे कि कई
लोगों ने मुझसे कहा कि भूपेन कुछ अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के तो नही लगते। मैंने कहा नही, मुझे तो वो ऐसे नही लगते। सिनेमा हो या कहानी, राजनीति हो या थियेटर - किसी भी विषय पर उनसे बात कर लीजिये, कई सारी नई जानकारियां मिलेंगी। ज्यादातर लोगों को पता होगा कि भूपेन इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार हैं। लेकिन अब ऐसा नही है। मीडिया जगत की हंस नुमा कहानियों के किसी नायक की तरह उन्होंने इस दुनिया को न अलविदा करने का पूरा मन बना लिया बल्कि उन्होंने पत्रकारिता जगत को अलविदा कर दिया है.... पिछले कुछ सालों मे उनसे मेरी वाकफियत के दौरान मैंने जितना उन्हें जाना है, उसके मुताबिक ये काम तो उन्हें कई सालों पहले कर लेना चाहिए था, लेकिन अब जाकर किया है, तो अब भी अच्छा ही है। आज तक हमारी जब भी मुलाकात हुई, उन्होंने मुझसे हमेशा ही कहा कि काश उन्हें कही पढ़ाने को मिल जाए। पढाना भूपेन का सपना था और अब हकीकत मे बदल रहा है। इस सपने को पूरा करने मे मेरा मानना है कि उनके दफ्तर , उनके कामकाज का भी बड़ा हाथ रहा है। पिछले कुछ दिनों से वह मुझसे लगातार कह रहे थे कि अब दफ्तर मे काम करना आसान नही रह गया है। पिछले महीने मिले तो बुरी तरह मानसिक रूप से थके हुए। (भूपेन के मानसिक रूप से थके होने पर भी हमने कितने मजे किए, वो किस्सा बाद मे ) तब भी उन्होंने यही इच्छा जाहिर की थी। भूपेन अपने सपने को आंशिक रूप से साकार करने मे कामयाब हो गए हैं, फिलहाल आई ई एम् सी मे पढ़ा रहे हैं। रोज सुबह ऑन लाइन उनसे जब बात होती है तो अब भूपेन यह नही कहते कि काश पढाने को मिल जाता.....भूपेन कहते हैं कि बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे... वैसे भूपेन जैसे पत्रकार का जाना पत्रकारिता जगत के लिए काफ़ी नुकसानदायक है। भूपेन को जितना मैं जानता हूँ, उनके जैसे पत्रकार पत्रकारों मे उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। ये पत्रकारिता जगत की खामी रही की ये जगत उन्हें संभल नही पाया, खो दिया।
लोगों ने मुझसे कहा कि भूपेन कुछ अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के तो नही लगते। मैंने कहा नही, मुझे तो वो ऐसे नही लगते। सिनेमा हो या कहानी, राजनीति हो या थियेटर - किसी भी विषय पर उनसे बात कर लीजिये, कई सारी नई जानकारियां मिलेंगी। ज्यादातर लोगों को पता होगा कि भूपेन इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार हैं। लेकिन अब ऐसा नही है। मीडिया जगत की हंस नुमा कहानियों के किसी नायक की तरह उन्होंने इस दुनिया को न अलविदा करने का पूरा मन बना लिया बल्कि उन्होंने पत्रकारिता जगत को अलविदा कर दिया है.... पिछले कुछ सालों मे उनसे मेरी वाकफियत के दौरान मैंने जितना उन्हें जाना है, उसके मुताबिक ये काम तो उन्हें कई सालों पहले कर लेना चाहिए था, लेकिन अब जाकर किया है, तो अब भी अच्छा ही है। आज तक हमारी जब भी मुलाकात हुई, उन्होंने मुझसे हमेशा ही कहा कि काश उन्हें कही पढ़ाने को मिल जाए। पढाना भूपेन का सपना था और अब हकीकत मे बदल रहा है। इस सपने को पूरा करने मे मेरा मानना है कि उनके दफ्तर , उनके कामकाज का भी बड़ा हाथ रहा है। पिछले कुछ दिनों से वह मुझसे लगातार कह रहे थे कि अब दफ्तर मे काम करना आसान नही रह गया है। पिछले महीने मिले तो बुरी तरह मानसिक रूप से थके हुए। (भूपेन के मानसिक रूप से थके होने पर भी हमने कितने मजे किए, वो किस्सा बाद मे ) तब भी उन्होंने यही इच्छा जाहिर की थी। भूपेन अपने सपने को आंशिक रूप से साकार करने मे कामयाब हो गए हैं, फिलहाल आई ई एम् सी मे पढ़ा रहे हैं। रोज सुबह ऑन लाइन उनसे जब बात होती है तो अब भूपेन यह नही कहते कि काश पढाने को मिल जाता.....भूपेन कहते हैं कि बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे... वैसे भूपेन जैसे पत्रकार का जाना पत्रकारिता जगत के लिए काफ़ी नुकसानदायक है। भूपेन को जितना मैं जानता हूँ, उनके जैसे पत्रकार पत्रकारों मे उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। ये पत्रकारिता जगत की खामी रही की ये जगत उन्हें संभल नही पाया, खो दिया।
Sunday, August 9, 2009
ता चढ़ मुल्ला बांग दे....
ईश्वर के अस्तित्व पर काफ़ी बातें हुई और काफ़ी हो रही हैं, उनसे इसका कोई मतलब नही। मुद्दा तो ये है कि ये पूरी तरह से मान लिया गया है कि ईश्वर एक मूर्त प्राणी है, उसे सब कुछ दिखाई देता है , सुनाई देता है। लेकिन ऐसा पहली बार लगा कि पिछले कुछ दशकों से ईश्वर को थोड़ा कम सुनाई देने लगा है। मतलब
अब ईश्वर बूढे हो चले हैं, आँख की नजर का तो पता नही लेकिन कान का हाल बराबर पता चल रहा है। मुहल्ले मे रामायण हो या मस्जिद मे अजान। सब कुछ बाकायदा लाउड स्पीकर पे हो रहा है। अब ये सब लोगों को सुनाने के लिए हो रहा है या ईश्वर को, ये तो लाउड स्पीकर लगाने वाले जाने, बहरहाल, लाउड स्पीकर से एक बात तो साफ़ हो गई है कि ईश्वर अब कान के कच्चे होते जा रहे हैं। वैसे गाव मे मेरे एक नाना भी थे जो थोड़े से कान के कच्चे थे। जो कुछ भी सुनते थे, थोडी देर मे ही उसमे दस प्रतिशत का इजाफा हो जाता था और वो भी ख़ुद उनकी तरफ़ से। जैसे एक बार मामा के लड़के ने उनसे कहा कि ट्यूबवेल ख़राब हो गई है, मिस्त्री लाना पड़ेगा तब जाकर सिंचाई हो पायेगी। थोडी देर बाद जब मामा आए तो उन्होंने उनसे कहा कि ट्यूब वेल मे आग लग गई है, लड़का गया है बाजार, मिस्त्री को लेकर आग बुझायेगा। बहरहाल ये उनके उम्र की बात थी। लेकिन ईश्वर कुछ इस कदर कान के कच्चे हो गए है कि अभी कुछ दिन पहले मेरे इलाके मे एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या प्रोपर्टी के चक्कर मे हुई थी लेकिन थोडी देर मे मेरे पास फोन आने लगे कि कही धार्मिक बवाल हो गया है क्या? बूढा गए ईश्वर न जाने कैसी कैसी अफवाह फैलाते हैं। बहरहाल, बात हो रही थी ईश्वर के कान के कच्चे होने पर। आजकल तो मैंने देखा है कि तकरीबन सभी धर्मो के लोगों ने लौद्स्पीकर का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। सब चाहते हैं कि उन्ही की आवाज ईश्वर सुने। इसलिए वोल्यूम भी हाई करके रखते हैं। खासतौर पर सुबह के टाइम, जब गजब की नींद आती है तो पता चलता है आवाज लगा रहा है अपने ईश्वर को। अम्मा कहती थीं कि सुबह सुबह उठकर ईश्वर का नाम सुनना चाहिए। लेकिन कौन से ईश्वर का नाम सुनना चाहिए। सुबह सुबह अगर लाउद्स्पीकर की तेज आवाज से नींद टूटे तो गालियाँ किसे देनी चाहिए। या रात मे जब थक हार के घर लौटे हों और तेज़ आवाज मे जागरण हो रहा हो तो क्या करना चाहिए। अम्मा ने बताया ही नही।
अब ईश्वर बूढे हो चले हैं, आँख की नजर का तो पता नही लेकिन कान का हाल बराबर पता चल रहा है। मुहल्ले मे रामायण हो या मस्जिद मे अजान। सब कुछ बाकायदा लाउड स्पीकर पे हो रहा है। अब ये सब लोगों को सुनाने के लिए हो रहा है या ईश्वर को, ये तो लाउड स्पीकर लगाने वाले जाने, बहरहाल, लाउड स्पीकर से एक बात तो साफ़ हो गई है कि ईश्वर अब कान के कच्चे होते जा रहे हैं। वैसे गाव मे मेरे एक नाना भी थे जो थोड़े से कान के कच्चे थे। जो कुछ भी सुनते थे, थोडी देर मे ही उसमे दस प्रतिशत का इजाफा हो जाता था और वो भी ख़ुद उनकी तरफ़ से। जैसे एक बार मामा के लड़के ने उनसे कहा कि ट्यूबवेल ख़राब हो गई है, मिस्त्री लाना पड़ेगा तब जाकर सिंचाई हो पायेगी। थोडी देर बाद जब मामा आए तो उन्होंने उनसे कहा कि ट्यूब वेल मे आग लग गई है, लड़का गया है बाजार, मिस्त्री को लेकर आग बुझायेगा। बहरहाल ये उनके उम्र की बात थी। लेकिन ईश्वर कुछ इस कदर कान के कच्चे हो गए है कि अभी कुछ दिन पहले मेरे इलाके मे एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या प्रोपर्टी के चक्कर मे हुई थी लेकिन थोडी देर मे मेरे पास फोन आने लगे कि कही धार्मिक बवाल हो गया है क्या? बूढा गए ईश्वर न जाने कैसी कैसी अफवाह फैलाते हैं। बहरहाल, बात हो रही थी ईश्वर के कान के कच्चे होने पर। आजकल तो मैंने देखा है कि तकरीबन सभी धर्मो के लोगों ने लौद्स्पीकर का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। सब चाहते हैं कि उन्ही की आवाज ईश्वर सुने। इसलिए वोल्यूम भी हाई करके रखते हैं। खासतौर पर सुबह के टाइम, जब गजब की नींद आती है तो पता चलता है आवाज लगा रहा है अपने ईश्वर को। अम्मा कहती थीं कि सुबह सुबह उठकर ईश्वर का नाम सुनना चाहिए। लेकिन कौन से ईश्वर का नाम सुनना चाहिए। सुबह सुबह अगर लाउद्स्पीकर की तेज आवाज से नींद टूटे तो गालियाँ किसे देनी चाहिए। या रात मे जब थक हार के घर लौटे हों और तेज़ आवाज मे जागरण हो रहा हो तो क्या करना चाहिए। अम्मा ने बताया ही नही।
बहाने बरसात के...
इधर पिछले कई दिनों से बरसात बिल्कुल नही हो रही है। वैसे गाजियाबाद मे कई लोगों को मैंने ये भी कहते सुना की अगर महिलायें खेत मे हल चला लेती, तो हो सकता था कि बरसात हो जाती। हवन वगैरह तो लोगों ने बहुत किए, लेकिन बरसात नही हुई। कुछ दिन पहले गाव होकर आया। शाम के वक्त गाव मे अंडा करी बनवाई थी। अभी
भी
गाव मे अंडा एक ऐसी वस्तु मानी जाती है जिसे ठेले पे या घर के बाहर कही भी खा सकते हैं, सार्वजनिक तौर पे खा सकते हैं लेकिन अ-सार्वजनिक तौर पर अगर घर मे खाना चाहे तो नही खा सकते। बहरहाल अंडा करी बनी और ट्यूब वेल मे महफ़िल जमाई गई। अभी अंडा करी लेकर मेरी बुआ का लड़का आ ही रहा था कि जोर की बरसात शुरू हो गई। काफ़ी तेज पानी बरस रहा था। मैं उस पानी मे खूब भीगा। खेतों मे जाकर भीगा हालाँकि खेतों मे उगे खर पतवार मेरे पैरों मे खूब गडे लेकिन इतनी सुहानी बरसात मे भीगने का मजा यूँ ही छोड़ा नही जा सकता था। उसके बाद आराम से वापस उसी ट्यूब वेल मे आया और दो दो पैग वोदका के लिए, बुआ का लड़का घर से चुपके से रोटी लेकर आया था जिससे अंडा करी खायी गई। वापस गाजियाबाद आया तो देखा कि यहाँ वही भीषण गर्मी हाहाकार मचाये हुए थी। बरसात तो क्या- बूंदा बंदी का कही कोई नामोनिशान नही था। तबसे अभी तक तकरीबन पन्द्रह दिन बीत गए हैं या शायद उससे भी ज्यादा। गर्मी है कि दिनोदिन लगातार बढती ही जा रही है। इधर सुना था कि जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया जा सकता है लेकिन उसके बाद कोई ख़बर नही आई। वैसे भी जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने से क्या ठंडक मिल जायेगी जिले को, या फ़िर बरसात के कुछ छींटे आकर गिर पड़ेंगे। बरसात चाहिए.....कैसे भी किसी भी तरह। बहुत जरूरी है। खेत ही नही, अब तो आँखे भी सूखने लगी हैं। न जाने कब बरसात होगी , या फ़िर अगस्त का महीना ऐसे ही सूखे सूखे निकल जाएगा....
भी
गाव मे अंडा एक ऐसी वस्तु मानी जाती है जिसे ठेले पे या घर के बाहर कही भी खा सकते हैं, सार्वजनिक तौर पे खा सकते हैं लेकिन अ-सार्वजनिक तौर पर अगर घर मे खाना चाहे तो नही खा सकते। बहरहाल अंडा करी बनी और ट्यूब वेल मे महफ़िल जमाई गई। अभी अंडा करी लेकर मेरी बुआ का लड़का आ ही रहा था कि जोर की बरसात शुरू हो गई। काफ़ी तेज पानी बरस रहा था। मैं उस पानी मे खूब भीगा। खेतों मे जाकर भीगा हालाँकि खेतों मे उगे खर पतवार मेरे पैरों मे खूब गडे लेकिन इतनी सुहानी बरसात मे भीगने का मजा यूँ ही छोड़ा नही जा सकता था। उसके बाद आराम से वापस उसी ट्यूब वेल मे आया और दो दो पैग वोदका के लिए, बुआ का लड़का घर से चुपके से रोटी लेकर आया था जिससे अंडा करी खायी गई। वापस गाजियाबाद आया तो देखा कि यहाँ वही भीषण गर्मी हाहाकार मचाये हुए थी। बरसात तो क्या- बूंदा बंदी का कही कोई नामोनिशान नही था। तबसे अभी तक तकरीबन पन्द्रह दिन बीत गए हैं या शायद उससे भी ज्यादा। गर्मी है कि दिनोदिन लगातार बढती ही जा रही है। इधर सुना था कि जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया जा सकता है लेकिन उसके बाद कोई ख़बर नही आई। वैसे भी जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने से क्या ठंडक मिल जायेगी जिले को, या फ़िर बरसात के कुछ छींटे आकर गिर पड़ेंगे। बरसात चाहिए.....कैसे भी किसी भी तरह। बहुत जरूरी है। खेत ही नही, अब तो आँखे भी सूखने लगी हैं। न जाने कब बरसात होगी , या फ़िर अगस्त का महीना ऐसे ही सूखे सूखे निकल जाएगा....
Saturday, August 8, 2009
बड़े मियां
एक अरसा हो गया कहानी से गुजरे हुए। सच मे एक अरसा बीत गया। भाषा तो ख़राब हो ही गई, सोच का भी बंटाधार हुआ पड़ा है। विरोधाभास तो इतने हो गए हैं कि पूछना ही बेकार है। कुल मिलकर एक नागफनी का जंगल सा बन गया है, जिधर जाओ उधर ही रहयिश न हो। इतने सरे विरोधाभासों के बीच एक कहानी जन्म ले रही है, लेकिन ये भी उनसे परे नही लगती....
वैसे बड़े मियां उम्र को दरकिनार कर ख़ुद को कभी बूढा नही मानते थे। उनका कहना था की जवानी तो एक अहसास भर है, जब अहसास होना बंद हो जाए तो समझो गई। और अगर ९० साल की उम्र तक अहसास होता रहे तो पठ्ठा ९० साल की उम्र मे जवान है। सुबह सवेरे जब सरकारी हैन्पंप पर अंजोरी मे अपना गुल मजन लेके आते, मुहल्ले के लुख्खों की भीड़ आसपास ही रहती। उनसे बात करने के लिए नही, इसलिए कि अभी मुह
ल्ले की कुछ एक लड़कियां, औरतें उनके पास आएँगी कि बड़े मियां बासी मुह हैं, सर पे एक फूंक मार देंगे । ये सब बड़े मियां की पकी हुई दाढी और कंधे तक लटकते बालों के कारण होता और बड़े मियां ये सब जानते हुए भी उन्हें कटवाने के बारे मे कभी भी नही सोचते। आख़िर कुछ तो जवानी की अकड़ होनी चाहिए थी। जवानी मे मुहल्ले की शब्बो , शकीला, जाहिरा, शमायला और पंडितानी तक उनके इसी बालों पर मरती थीं। अब भले ही उन सबके चेहरे झुर्रियों से भर गए हों, बड़े मिया ख़ुद को उसी उम्र का समझते थे। बहरहाल सुबह सवेरे बड़े मियां अंजोरी मे गुल मजन लेके विजय की दुकान के सामने वाले इंडिया मार्का हैण्ड पम्प पर पहुचे। अभी ऊँगली गुल मे डुबोई भी नही थी कि कुरैश निस्वां के पास रहने वाली आयशा आ गई। उसके बच्चे को तीन दिन से बुखार था। बोली, बड़े मिया, नजर सी लग गई दिखे है। एकाध फूंक सी मार देते तो ..... बड़े मियां ने इससे आगे और कुछ नही सुना, अंगूठे और कानी ऊँगली से बच्चे का माथा पकड़ा और कुछ बुदबुदाते हुए धीमे धीमे 'फूंक सी' मारने लगे। इधर मुहल्ले के लुख्खों की टिप्पणियां जारी रहीं- बड़े मियां, आराम से !!! उड़ न जाए कहीं... बहरहाल , शमायला गई। तभी बापू बालिका मे पढने वाली अकीला आती दिखी। लुख्खों की बांछे खिल गई। बड़े मिया की भी। आते ही अकीला बोली, बड़े मियां, आज गणित का पेपर है, फूंक मार दो पास होने वाली। बड़े मियां ने एक बार लुख्खों की तरफ़ देखा, फ़िर अकीला से बोले, चल, अपने घर की तरफ़ चल, वही आता हूँ। इस पर अकीला बोली, अभी सीधे स्कूल जा रही हूँ, अभी फूंक मारो। आखिरकार बड़े मियां ने बुदबुदाना शुरू किया। अकीला कभी बड़े मियां के हिलती दाढी देखती तो कभी लुख्खों को। उनमे से रहमान उसे पसंद था लेकिन वो तो दिखाई ही नही दे रहा था। उसने सोचा था कि फूंक के बहाने जायेगी तो रहमान को एक नजर देख लेगी। फ़िर आगे का गणित और रेखागणित, सारे सवाल वो रहमान के हवाले कर देगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और बड़े मियां की फूंक बे असर चली गई।
जारी .....
वैसे बड़े मियां उम्र को दरकिनार कर ख़ुद को कभी बूढा नही मानते थे। उनका कहना था की जवानी तो एक अहसास भर है, जब अहसास होना बंद हो जाए तो समझो गई। और अगर ९० साल की उम्र तक अहसास होता रहे तो पठ्ठा ९० साल की उम्र मे जवान है। सुबह सवेरे जब सरकारी हैन्पंप पर अंजोरी मे अपना गुल मजन लेके आते, मुहल्ले के लुख्खों की भीड़ आसपास ही रहती। उनसे बात करने के लिए नही, इसलिए कि अभी मुह
ल्ले की कुछ एक लड़कियां, औरतें उनके पास आएँगी कि बड़े मियां बासी मुह हैं, सर पे एक फूंक मार देंगे । ये सब बड़े मियां की पकी हुई दाढी और कंधे तक लटकते बालों के कारण होता और बड़े मियां ये सब जानते हुए भी उन्हें कटवाने के बारे मे कभी भी नही सोचते। आख़िर कुछ तो जवानी की अकड़ होनी चाहिए थी। जवानी मे मुहल्ले की शब्बो , शकीला, जाहिरा, शमायला और पंडितानी तक उनके इसी बालों पर मरती थीं। अब भले ही उन सबके चेहरे झुर्रियों से भर गए हों, बड़े मिया ख़ुद को उसी उम्र का समझते थे। बहरहाल सुबह सवेरे बड़े मियां अंजोरी मे गुल मजन लेके विजय की दुकान के सामने वाले इंडिया मार्का हैण्ड पम्प पर पहुचे। अभी ऊँगली गुल मे डुबोई भी नही थी कि कुरैश निस्वां के पास रहने वाली आयशा आ गई। उसके बच्चे को तीन दिन से बुखार था। बोली, बड़े मिया, नजर सी लग गई दिखे है। एकाध फूंक सी मार देते तो ..... बड़े मियां ने इससे आगे और कुछ नही सुना, अंगूठे और कानी ऊँगली से बच्चे का माथा पकड़ा और कुछ बुदबुदाते हुए धीमे धीमे 'फूंक सी' मारने लगे। इधर मुहल्ले के लुख्खों की टिप्पणियां जारी रहीं- बड़े मियां, आराम से !!! उड़ न जाए कहीं... बहरहाल , शमायला गई। तभी बापू बालिका मे पढने वाली अकीला आती दिखी। लुख्खों की बांछे खिल गई। बड़े मिया की भी। आते ही अकीला बोली, बड़े मियां, आज गणित का पेपर है, फूंक मार दो पास होने वाली। बड़े मियां ने एक बार लुख्खों की तरफ़ देखा, फ़िर अकीला से बोले, चल, अपने घर की तरफ़ चल, वही आता हूँ। इस पर अकीला बोली, अभी सीधे स्कूल जा रही हूँ, अभी फूंक मारो। आखिरकार बड़े मियां ने बुदबुदाना शुरू किया। अकीला कभी बड़े मियां के हिलती दाढी देखती तो कभी लुख्खों को। उनमे से रहमान उसे पसंद था लेकिन वो तो दिखाई ही नही दे रहा था। उसने सोचा था कि फूंक के बहाने जायेगी तो रहमान को एक नजर देख लेगी। फ़िर आगे का गणित और रेखागणित, सारे सवाल वो रहमान के हवाले कर देगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और बड़े मियां की फूंक बे असर चली गई।जारी .....
Thursday, August 6, 2009
कार्ड खरोचन मशीन
दफ्तर से वापस लौटकर कही बाहर जाने का मन नही होता है। और अगर थोड़ा सा भी पसर लिए, तब तो अल्लाह ही मालिक है। फ़िर तो चाहे कोई भी आवाज देता रहे, मैं और मेरी तन्हाई पीछा छोड़ने का नाम ही नही लेते। और अगर ऐसे मे अगर मजबूरन कुछ लाने बाहर निकलना हो और जेब मे
पैसे न हों तो.... पहले अम्मा याद आती थीं, अब ऐ टी एम् या वो कार्ड खरोचने वाली मशीन याद आती है। कुछ ख्याली पुलाव भी मन मे घपर झोल करने लगे। सोचा की काश ऐसा होता की जो समान मांगना है, उसका फोन पर ही ऑर्डर हो जाता और फोन करने पर जो डिलीवरी बॉय आता , वो वही कार्ड खरोचने वाली मशीन भी साथ लाता। अब जब कैश लेस बनने का संकल्प किया ही है तो ससुर सब्जी और बंधानी हींग भी घर पे ही कैश लेस मिले। लेकिन फ़िर सोचे साला ऐसा अगर हो गया तो ससुर पूरे देस की हालत ही पतली हो जायेगी। ब्लैक मनी कहा जायेगी? अब तो स्विस बैंक वाले भी मांगने पर डिटेल दे देते हैं। लोकसभा चुनाव मे ये मुद्दा खूब सुने थे। की हमारे देस मे भी लोगो के स्विस बैंक अकाउंट की डिटेल लाने की मांग चल रहे है....कान लगा, बहुत याद किया, पिछले डेढ़ दो महीने से ऐसी कोई बहस तो सुनाई नही दी। का हुआ सबको? सब चुप कहे मार गए हैं भाई? हेरा गए हैं शायद। बहरहाल, सोचे की कैश लेस बनने पर और क्या क्या होता, अपना हिंदुस्तान बदलता न बदलता, लेकिन अपना इंडिया तो खूब बदलता। पता लगता की ससुर चोर और लुटेरे घर आयेंगे, डेबिट या क्रेडिट कार्ड खरोचने वाली मशीन साथ लायेंगे, मुस्कुराते हुए पिस्तौल निकालेंगे और सर कहकर कार्ड से पैसा अपने अकाउंट मे ट्रांसफर करेंगे और जय श्री राम हो जायेंगे। अरे हाँ, ये भी तो किसी का मुद्दा था? ' जय श्री राम !!'' कहाँ गया? सुनाई नही देता आजकल। ये देखिये, कार्ड खरोचन मशीन केता तो खतरनाक है। वैसे इंडिया को ये कार्ड खरो
चन मशीन और आगे तक भी ले जा सकती है। राह चलते होल्ड अप करके कोई भी कार्ड खरोचन मशीन लेकर चाकू लगाकर कहेगा, ला बेटा, अंटी मे नही, कार्ड मे जो कुछ भी है निकाल के दे दे नही तो तेरे दिमाग से मेडिक्लेम का नंबर भुलवा दूंगा। मजाक नही है, अभी तीन दिन पहले मेरे एक दोस्त के साथ ऐसा ही हुआ, लुटेरो ने उन्हें कार मे लिफ्ट दी और ऐ टी एम् के सामने लेजाकर कोड पूछकर पैसे निकाल लिए। अहा...देश कैश लेस होने लगा है। सोचकर मन मे झुरझुरी सी हुई, फ़िर भी हिम्मत करके ऐ टी एम् तक जाना ही पड़ा। अब ताज़ी बीन्स कहा कार्ड खरोचन मशीन से घर बैठे आती है।
पैसे न हों तो.... पहले अम्मा याद आती थीं, अब ऐ टी एम् या वो कार्ड खरोचने वाली मशीन याद आती है। कुछ ख्याली पुलाव भी मन मे घपर झोल करने लगे। सोचा की काश ऐसा होता की जो समान मांगना है, उसका फोन पर ही ऑर्डर हो जाता और फोन करने पर जो डिलीवरी बॉय आता , वो वही कार्ड खरोचने वाली मशीन भी साथ लाता। अब जब कैश लेस बनने का संकल्प किया ही है तो ससुर सब्जी और बंधानी हींग भी घर पे ही कैश लेस मिले। लेकिन फ़िर सोचे साला ऐसा अगर हो गया तो ससुर पूरे देस की हालत ही पतली हो जायेगी। ब्लैक मनी कहा जायेगी? अब तो स्विस बैंक वाले भी मांगने पर डिटेल दे देते हैं। लोकसभा चुनाव मे ये मुद्दा खूब सुने थे। की हमारे देस मे भी लोगो के स्विस बैंक अकाउंट की डिटेल लाने की मांग चल रहे है....कान लगा, बहुत याद किया, पिछले डेढ़ दो महीने से ऐसी कोई बहस तो सुनाई नही दी। का हुआ सबको? सब चुप कहे मार गए हैं भाई? हेरा गए हैं शायद। बहरहाल, सोचे की कैश लेस बनने पर और क्या क्या होता, अपना हिंदुस्तान बदलता न बदलता, लेकिन अपना इंडिया तो खूब बदलता। पता लगता की ससुर चोर और लुटेरे घर आयेंगे, डेबिट या क्रेडिट कार्ड खरोचने वाली मशीन साथ लायेंगे, मुस्कुराते हुए पिस्तौल निकालेंगे और सर कहकर कार्ड से पैसा अपने अकाउंट मे ट्रांसफर करेंगे और जय श्री राम हो जायेंगे। अरे हाँ, ये भी तो किसी का मुद्दा था? ' जय श्री राम !!'' कहाँ गया? सुनाई नही देता आजकल। ये देखिये, कार्ड खरोचन मशीन केता तो खतरनाक है। वैसे इंडिया को ये कार्ड खरो
चन मशीन और आगे तक भी ले जा सकती है। राह चलते होल्ड अप करके कोई भी कार्ड खरोचन मशीन लेकर चाकू लगाकर कहेगा, ला बेटा, अंटी मे नही, कार्ड मे जो कुछ भी है निकाल के दे दे नही तो तेरे दिमाग से मेडिक्लेम का नंबर भुलवा दूंगा। मजाक नही है, अभी तीन दिन पहले मेरे एक दोस्त के साथ ऐसा ही हुआ, लुटेरो ने उन्हें कार मे लिफ्ट दी और ऐ टी एम् के सामने लेजाकर कोड पूछकर पैसे निकाल लिए। अहा...देश कैश लेस होने लगा है। सोचकर मन मे झुरझुरी सी हुई, फ़िर भी हिम्मत करके ऐ टी एम् तक जाना ही पड़ा। अब ताज़ी बीन्स कहा कार्ड खरोचन मशीन से घर बैठे आती है।
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