Tuesday, March 6, 2018

बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं

माया पारीक ने चार साल पहले लव मैरिज की थी। पारसी नेकजद से। पिछले साल अप्रैल में नेकजद हार्ट अटैक से मर गए। माया अब मायके में हैं क्योंकि नेकजद की फैमिली उन्हें वापस नहीं ले रही है। बार बार दोहराती हैं कि जो करना चाहती हैं, कर नहीं पा रही हैं। कहती हैं कि शादी के बाद जैसे-तैसे करके सबको ऑलमोस्ट मना लिया था। मगर अब नहीं मना पा रही हैं। नहीं मना पा रही हैं की बात उन्होंने चिट्ठी में नहीं बताई है, लेकिन अवचेतन के भय वहीं सुने जाते हैं, जहां चुप्पी होती है। जहां से कोई आवाज नहीं आती।

जो भय हमारी चेतना में होते हैं, उनके लिए हम कुछ न कुछ इंतजाम कर लेते हैं। दैहिक और आलमोस्ट मानसिक क्षतियों के लिए हमने कानून बना रखे हैं। जहां कानून नहीं हैं, वहां समाज, जाति और जितने हो सकते हैं, उन नामों के मुहर लगे नियम बना रखे हैं। आए दिन की जरूरत और नई मिलती समझ के साथ सब कुछ बदलते भी रहते हैं। फिर भी स्त्रियों का हाल बिलकुल भी नहीं बदला है तो वजह साफ है, कानून और समाज उनके असल भय तक पहुंच पाने में कामयाब नहीं है। अंदर से स्त्री को कोई छू ही नहीं रहा है। खुद स्त्री भी नहीं।

इस कॉलम के लिए काफी स्त्रियों ने अपनी सहेली की कहानियां भेजीं। कुछ ने बताया कि बंधकर बड़ी हुई उनकी सहेली ससुराल से बंधी तो सबसे पहले सास की पसंद की भिंडी और देवर के पसंद के पराठे बनाने सीखे। बच्चे पैदा किए। लड़की पैदा करने पर ताने झेले, मारपीट भी। बच्चे बड़े किए और अब अकेली है। पति होते हैं, मगर वह न होने के बराबर ही होते हैं। कुछ ने बताया कि उनकी सहेली ने फलां कपड़े पहन लिए तो पति देव पांच दिन तक फुंफकारते रहे। कुछ ने कहा कि वह अपने सहेली को समझाती हैं कि उसे कुछ करना चाहिए, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि उनकी ये सहेली कौन है? अपने यहां स्त्रियों ने अपने भय से बात करने की कला कुछ इसी तरह से विकसित की है, जिसका अंत निपट अकेलेपन के अंधेरे में खोया हुआ है।

वित्तीय सुरक्षा एक हद तक इस अंधेरे को साफ करने में कामयाब हुई है। पैसा कमाने वाली स्त्रियों में कमोबेश पैसा कमाने वाले पुरुषों जितनी ही बेफिक्री होती है। आखिरी अमेरिकी जनगणना बताती है कि स्त्रियों के पास वहां की कुल संपत्ति का 51 फीसद है। कुछ उन्हें मिलती है तो कुछ वह खुद कमाती हैं। इससे वह खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। अपने यहां जिस उम्र में आकर काफी सारी स्त्रियां अकेली हो जाती हैं, वहां उस उम्र में स्त्रियां जमकर जीना शुरू करती हैं। मगर फिर भी, वैसा जीना भी अवचेतन में बसे उस भय का स्थाई इलाज नहीं कर पा रहा है। अमेरिका की शिकागो और कॅलीफोर्निया यूनिवर्सिटी का एक संयुक्त अध्ययन बताता है कि वहां की लगभग आधी आबादी अवसादी अकेलेपन का शिकार है। 

कामकाजी होने के बावजूद स्त्रियां अवचेतन के भय पर खुलकर बात नहीं करतीं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें भरोसा नहीं है। कामकाजी तो दूर, स्त्री विमर्श और आंदोलनों से जुड़ी कई स्त्रियों ने इस विषय पर चुप्पी साध ली। संपत्ति की जायज मांग उठाएंगी की बात सभी ने बताई, लेकिन अपने घर में यह बात उठाई या नहीं उठाई, यह नहीं बताया। कानून और समाज अभी तक आधी आबादी के लिए जो कुछ कर पाया है, वह कहीं से भी पूरा नहीं है। और फिर पूरा हो भी जाएगा, तो भी यह भय खुलकर बह पाएगा, क्या कहा जा सकता है।

अवचेतन के भय को बहने के लिए भरोसे का ठोस मैदान चाहिए। जब यह मैदान स्त्री के पास होता है तो वह बहती है। बेफिक्री से स्त्री का बहना विरले ही देख पाते हैं। अभी यह मैदान क्यों नहीं है, यह भय खुलकर बाहर क्यों नहीं आ रहा है, माया पारीक के पत्र की आखिरी लाइन इसे अच्छे से समझा देती है। वह कहती हैं,  ‘शादी करके किसी की लाइफ नहीं खराब करना चाहती। इसमें गलती किसी की भी नहीं है, लेकिन टाइम खराब चल रहा है।’

नोट: मैं कोई स्त्री विर्मशकर्ता नहीं। बनना भी नहीं है। स्त्रियों ने जो बताया, और जो नहीं बताया, बस वही लिखा है।

Sunday, March 4, 2018

एक और जज का तबादला: अमित शाह को बचाने की कोशिश



सोहराबुद्दीन मामले में आया जज लोया जैसा मोड़, जस्टिस रेवती मोहिते डेरे का क्यों किया गया तबादला? 

गुजरात में हुए सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में भी वही मोड़ ला दिया गया है जो जज लोया वाले मामले में कभी लाया गया था। गनीमत बस इतनी है कि इस मोड़ पर आने वाला जज जिंदा खड़ा है, जबकि जज लोया को जिंदा मार दिया गया था। सोहराबुद्दीन मामले की पुनर्विचार अर्जियां अभी तक जस्टिस रेवती मोहिते डेरे सुन रही थीं लेकिन 26 फरवरी से उन्हें जस्टिस एनडब्ल्यू सांबरे के हवाले कर दिया गया है। हालांकि जिम्मेदारियों में तब्दीली नियमित तौर पर होने वाले रोस्टर का हिस्सा है जहां ढेर सारी दूसरी बेंचों को भी बदला जाता है। लेकिन इस मामले में इस लिए लोगों की भौंहें तन गयी हैं क्योंकि सच्चाई ये है कि जस्टिस रेवती मोहिते डेरे पिछले तीन हफ्ते से मामले की सुनवाई कर रही हैं।

बांबे लायर्स एसोसिएशन (बीएलए) ने बांबे हाईकोर्ट की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश वीके ताहिलरमानी को पत्र लिखकर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले को सुनवाई के लिए दूसरे जज को देने के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश को संबोधित और बीएलए अध्यक्ष अहमद आबदी द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है कि “जस्टिस डेरे केस के मामले में सीबीआई के रवैये को लेकर जिस तरह से लगातार उसे फटकार लगा रहीं थीं उससे (तबादले के फैसले को) खासकर साजिश माना रहा है।” जस्टिस रेवती डेरे का सीबीआई के रवैये को लेकर बेहद आलोचनात्मक रुख था। उन्होंने साफ-साफ कहा था कि सीबीआई कोर्ट को सहयोग नहीं कर रही है। उसकी तमाम कमियों के लिए उसे कई बार फटकार भी लगायी थी। उन्होंने सीबीआई और सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की ओर से दायर याचिकाओं का नियमित आधार पर सुनवाई शुरू कर दी थी। इतना ही नहीं पिछले महीने सोहराबुद्दीन मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा मीडिया कवरेज पर लगाए गई पाबंदी को भी हटा दिया था। नई जिम्मेदारी के मुताबिक जस्टिस रेवती डेरे अब जमानत, अग्रिम जमानत, और जमानत से जुड़ी अर्जियों की सुनवाई करेंगी।

बीएलए ने जो पत्र भेजा है, उसके मुताबिक 38 आरोपियों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत 15 को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया है। सबसे बड़ी अचरज की बात ये है कि 42 गवाहों में 34 अपने बयानों से पलट गए हैं। बीएलए का कहना है कि “इस पृष्ठभूमि में जस्टिस डेरे के एसाइनमेंट को बदला जाना जनता में एक गलत संदेश भेज रहा है। और लोगों का न्यायपालिका की संस्था में विश्वास को भी कमजोर कर रहा है।” बीएलए ने अमित शाह के बरी होने को चुनौती देने के लिए सीबीआई को निर्देश देने संबंधी बांबे हाईकोर्ट में दायर एक पीआईएल को सुनवाई के लिए जस्टिस भूषण गवई की बेंच को दिए जाने पर भी सवाल उठाया है। जस्टिस गवई उन दो जजों में से एक हैं जिसने मीडिया को बताया है कि सीबीआई जज बीएच लोया की मौत में कुछ भी छुपाया नहीं जा रहा है। आपको याद होगा कि जज लोया जो सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे थे उनकी 1 दिसंबर को नागपुर में कथित तौर पर दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी थी। तब वो अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए वहां गए थे। जज की मौत की जांच के लिए ढेर सारी याचिकाएं दायर की गयी हैं।

इस मामले में बीएलए ने कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश से सुधारात्मक कार्रवाई करने की अपील की है। उसने कहा है कि “क्योंकि केवल न्याय नहीं होना चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।” इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बांबे हाईकोर्ट में सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई करने वाली जस्टिस मोहते डेरे को केस से हटाए जाने के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूरी प्रगति पर टिप्पणी करते हुए कांग्रेस चीफ ने मंगलवार को एक ट्वीट के जरिये कहा कि “सोहराबुद्दीन केस ने एक और जज को ले लिया। सीबीआई को चुनौती देने वाली जस्टिस रेवती डेरे को हटा दिया गया है।” उन्होंने पूछा कि “जज जेटी उत्पट ने अमित शाह से सुनवाई में उपस्थित होने के लिए कहा और हटा दिए गए थे। जज लोया ने कठिन सवाल पूछे। वो मर गए। इस बीच हाईकोर्ट ने मौजूदा सूची में बदलाव को रूटीन करार दिया है।

सुनवाई के दौरान 29 जनवरी 2018 को जस्टिस डेरे ने सीबीआई से पूछा था कि वह पुनर्विचार अर्जियों की तेजी से सुनवाई के लिए कोई इच्छा क्यों नहीं प्रकट कर रही है। जैसा कि ट्रायल स्पेशल सीबीआई कोर्ट में नवंबर 2017 से शुरू हो गया था। इस मामले में कुल 42 गवाह थे जिसमें 34 पहले ही पलट गए हैं। 12 फरवरी को सुनवाई के दौरान दो और गवाह पलट गए। इस पर जस्टिस रेवती डेरे ने सीबीआई से पूछा था कि गवाहों की सुरक्षा के लिए वो क्या कर रही है? लाइवलॉ वेबसाइट के हवाले से आयी खबर के मुताबिक जज ने कहा था कि “क्या ये सीबीआई की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वो गवाहों की रक्षा करे जिससे वो आरोपियों के सामने बेखौफ होकर अपना पक्ष रख सकें? इस बात पर विचार करते हुए कि ढेर सारे गवाह स्पेशल सीबीआई कोर्ट के सामने मुकर चुके हैं उन्होंने पूछा था कि क्या आप उन्हें कोई सुरक्षा देने जा रहे हैं? आपकी जिम्मेदारी केवल चार्जशीट भरने से नहीं पूरी हो जाती है। अपने गवाहों की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी है।” इससे आगे जाते हुए जज ने कहा कि “ आप एक मूक दर्शक नहीं हो सकते हैं। मैं उस तरह का सहयोग नहीं पा रही हूं जैसा मुझे सीबीआई की तरफ से मिलना चाहिए था। अगर यही आपका रवैया है तब आप ट्रायल ही क्यों चलवा रहे हैं।”

इस बीच हमने आरोपियों के बरी होने को चुनौती देने वाले सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन से बात की। उन्होंने बताया कि उनकी अपने वकील से बात हुई है और केस की अगली जो तारीख लगेगी उस मौके पर वो अपना एतराज जताएंगे। और मामले को जस्टिस मोहिते डेरे के पास ही रहने देने की अपील करेंगे। बताया जा रहा है कि इस तरह के मामलों में अभियोजन पक्ष या फिर याचिकाकर्ता मुख्य न्यायाधीश से अपील कर सकते हैं। खासकर ऐसे मामलों में जिनका बड़ा हिस्सा किसी जज ने सुन लिया हो। ऐसे में जिम्मेदारी को बदलने की जगह बाकी सुनवाई को भी उसके द्वारा ही पूरी किए जाने पर विचार हो सकता है। अंग्रेजी समाचार वेबसाइट स्क्रोल से बातचीत में बांबे हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ वकील ने कहा कि जजों का ये एसाइनमेंट रूटीन हो सकता है और उसमें शायद कोई असामान्य बात न हो लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि जस्टिस डेरे ने सभी पक्षों की ज्यादातर बहसों की सुनवाई पूरी कर ली थी।

पहले रुबाबुद्दीन का प्रतिनिधित्व कर चुके वकील विजय हीरेमथ ने कहा कि “8 या 10 सप्ताह में जिम्मेदारियों में बदलाव किया जाता है लेकिन इस केस में पिछले तीन हफ्ते से नियमित सुनवाई चल रही है। और बहुत ज्यादा बहसें पूरी हो चुकी हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “पूरे मामले की फिर से सुनवाई इसमें शामिल किसी के लिए भी समय की बर्बादी होगी।” वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि हालांकि हाईकोर्ट में रोस्टर में बदलाव कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। अगर एक जज कोई केस सुन चुका है तब उस केस को सामान्य तौर पर उसे ही भेज दिया जाता है और उसे एक हिस्से की सुनवाई हो चुके मामलों में रखा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर इस खास केस को उनके साथ नहीं रखा जाएगा तब ये निश्चित तौर पर एक असामान्य बात होगी और फिर रोस्टर में बदलाव एक गलत मंशा को दर्शाएगी। और खासकर उनकी सीबीआई के रवैये पर की गयी टिप्पणी को देखते हुए इसकी आशंका और बढ़ जाएगी। बांबे हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय थिप्से ने कहा कि “....इसमें एक सुधार हो सकता है- दोनों पक्ष चीफ जस्टिस से मिलकर उनसे केस को उसी जज के तहत जारी रखने की अनुमति हासिल कर सकते हैं।” उन्होंने कहा कि आमतौर पर जज खुद इस तरह का निवेदन नहीं करते हैं जब तक कि कोई एक पक्ष इस तरह का सुझाव नहीं देता है।

Tuesday, February 20, 2018

हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां

नये नवाचारों व नवशुचिताओं को नये सन्‍दर्भ देती, किंचित अटक-अटककर ही सही, महानगरीय अंतर्मन की उखड़ाहटों को एक नूतनभाव, हर्षोत्‍कंठ जो एक समर्थ रचनाशीलता में कमोबेश एक ऐंठी वाचालता व विचलनधर्म में बंधी, मगर साथ ही उतनी ही उन्‍मुक्‍त-उन्‍मत्‍त भी, बहती गंगा-सी शनै: शनै: स्‍वयं को प्रकटाना शुरु की है, उस पकड़ की ताकत व ताकत की पकड़ को बहुत ही मजबूत बिम्‍ब-विधानों में “हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां” में पढ़ा जा सकता है. रचनाकार धीमे-धीमे औधड़ावस्‍था को प्राप्‍त हो रहे राहुल राहीव राइजिंग पांडे द्वय हैं, इब्‍ने व सफ़ी किम्‍बा गुलशन व नन्‍दा की तरह जिनकी देह भले दो हो, आत्‍मा का स्‍वर एक और वही विचलनधर्मिता की बुनावटों में गहरे निबद्ध है. या ‘आबद्ध’ है? जो भी है, गहरे से है. उदासियों में घुली, करुणात्‍कता के उद्दंड मुहावरों व प्रीतिहीनता के मुंडेरों से कौंध-कौंधकर कूद लेने को मचलती, ये कहानियां न कहीं शुरु होती हैं, न आखिर में कहीं पहुंचती हैं. पहुंचना चाहती भी नहीं. क्‍योंकि अपनी गहरी चोटों व बदहवास बेचैनियों ने उन्‍हें पश्चिमी दिल्‍ली की दिल मसलनेवाली सड़कों पर बहुत पहले यह निर्मम सबक दिया है कि पहुंचने को भी वही तीन पत्रिकाएं हैं, और चाहने को चार नौकरियां, प्रेम कहीं नहीं है. प्रेमिल मनवंचनाओं के गाढ़े, धूसर कार्य व क्रिया-व्‍यापार हैं. और कैसी भी क्रियात्‍मकता, कर्तव्‍यशीलता क्रय-विनिमय के नये उचाट परिहासलोक में ही पहुंचकर अंतत: सांस लेती, किम्‍बा दम तोड़ती है. 

संदिग्‍ध विद्वनशीलता के सीमित प्रतिमानी क्षेत्रों के चंद आलोचन पंडितों के बीच हालांकि दबी-दबी ऐसी फुसफुसाहटें हैं कि नवस्‍वर की इस नयी रचनाशीलता में नया कुछ भी नहीं, उन पर सीधे-सीधे मलयभूमि व मलेशियाई उद्वेलनाकांत कथाकारों की स्‍पष्‍ट छाप है, जो कहीं आगे जाकर विधर्मी जापानी फिल्‍मकारों की नवधृष्‍टताओं में बहलती, अनंतर कहीं गुम जाती हैं, और राहुल राही व राइजिंग पांडे अभी सजग न हुए तो आगे भी ऐसी ही रहेंगी. गुम. जबकि लेखकद्वय का इस पर स्‍पष्‍ट मतांतर है, और अभी भी, यही मानना है कि उनका अनुभवाकाश पूर्वी उत्‍तरप्रदेश व दिल्‍ली के पश्चिमदेश से बाहर अगर कहीं उतरता है तो वह यू-ट्यूब पर ‘लूज़ टाक’ के कुछ अकिंचन वीडियो व हबीब जालिब के मनोहारी गायन को खाने, व अन्‍य दैनंदिन के दैन्‍य, दैहिक क्रियाओं की निष्‍पत्ति तक ही पहुंचने को जाता है और वहीं बना रहता है. मलयभूमि व मलेशियाई संसार को वह जानते हैं इसी संसार में कहीं है, मगर कहां है इसकी चिन्‍ता में नहीं पड़ते. अपरिचय के ऐसे वीरानों के साहित्‍य को तो वह रात के सपनों में भी नहीं पहचानते.

जो भी व जैसा भी हो, नवाचारी नवउत्‍कर्षशीलता में सीलती ये कहानियां हिन्‍दी के आकाश में धीमे-धीमे उतरती उसे गहरे अर्थों में भर रही हैं, यह गहरे संतोष का विषय है. कम से कम तीन पत्रिकाओं व चार नौकरियों के लिहाज़ से तो है ही. दु:खकातर प्रसंग इतना भर है कि उसी उद्यमशीलता में नीमअंधेर प्रकाशन (गाजियाबाद), किम्‍बा भावना एंड मिसिर पब्लिकेशंस (ओन्‍ली इंगलिश), कानपुर मालूम नहीं क्‍यों सामने आने व प्रकाशकीय जिम्‍मा उठाने में लजाये, सकुचाये हुए हैं. सोचनेवाली बात है “हिला हुआ आदमी व नवाक्षरित उत्‍कर्षशील अन्‍य कहानियां” महानगरीय मलिन धुंधलकों को नवसंदर्भ देगी, या जो जहां देना है, उसे महानगर ही देता रहेगा?
- हिलते उत्कर्ष के शील- प्रमोद सिंह

Wednesday, December 27, 2017

FRDI Bill: क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है?

वैसे हम ये भी पूछ सकते हैं कि क्या टैक्स के पैसों से बैंक बचाना ठीक है? थ्योरिटिकली इसका जवाब हां है। मगर तब, जब कि बैंक अपनी तय सामाजिक भूमिका निभा रहे हों। अगर बैंक पैसों को सट्टा बाजार में लगा रहे हैं और इसी वजह से दुखी हैं तो यह ठीक नहीं है। क्योंकि ये वो काम नहीं है जिसके लिए इन बैंकों को बनाया गया है। बैंकों को बचाने के लिए टैक्स का पैसा थ्योरिटकली उपलब्ध‘होना चाहिए, लेकिन बैंकों की सट्टा बाजारी जैसी हरकतों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण भी होना चाहिए।

अकेले उनका सरकारी होना एनफ नहीं है। इसके अलावा, टैक्सपेयर्स और बैंक में पैसा जमा करने वालों के बीच चलने वाला ये पूरा पचड़ा एक छलावा है जिसे एफआरडीआई विधेयक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए के बारे में इतना हल्लागुल्ला होने के बावजूद, ये संपत्तियां बैंक की कुल परिसंपत्तियों का लगभग 12 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इस तरह का तकरीबन 90 प्रतिशत एनपीए राष्ट्रीयकृत बैंकों का है। लेकिन कुल बैंकिंग व्यवसाय में ऐसे बैंकों के बड़े हिस्से को देखते हुए उनके एनपीए का भार इतना अधिक नहीं है कि उसे किसी तरह के खतरे की घंटी समझा जाए।  इसके अलावा, सरकार ने अभी-अभी सवा दो लाख करोड़ रुपये के रीकैपिटलाइजेशन की घोषणा की है। इसलिए अब तो बैंकों के पास तो पैसे ही पैसे हैं और सबकी हालत ठीक है। और आगे भी ठीक ही रहनी है।

अरुण जेटली संसद में ये जो बिल लाए हैं, इसे वह टैक्सपेयर्स और बैंक डिपॉजिटर्स के बीच हितों के संघर्ष की कल्पना करके ठीक कहने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा तो बस एक ही हाल में हो सकता है, जो अभी दूर-दूर तक नहीं दिख रहा। और अगर होगा भी तो उसे रोकने के कई तरीके हैं, जिनमें से एक चीज है सावधानी। लेकिन सावधानी को सरकार ने छह से दस बजे तक के लिए बैन कर दिया है। सरकार बिस्तर से लेकर बैंक तक बेतुकी बातें ही नहीं कर रही, बल्कि बेहद बदमाशी भरे फैसले भी करने की तैयारी में है। प्राइवेट कंपनी के लोन डिफाल्टर देश के कुल एनपीए में 75 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं, उनका गबन उन्हीं से वसूला जाना चाहिए। मगर अब ऐसा नहीं होगा। अब सरकार बहादुर ओपड़ी दी गुड़गुड़ फिटे मुंह पाकिस्तान टू दी हिंदुस्तान का इंतजाम है कि लोन लेकर भागने वालों का पैसा हम आप जैसे लोग भरेंगे, क्योंकि हम बैंक में पैसे जमा करते हैं।
समाप्त
Story- Pro. Prabhat Patnayak

पार्ट- 1- 

पार्ट- 2- 

पार्ट- 3- 

पार्ट- 4- 

पार्ट- 5- 

पार्ट- 6- 

FRDI Bill: बेहाल बैंकों की इक्विटी की औकात क्या होगी

वित्त मंत्री अरुण जेटली कह तो रहे हैं कि हमारे हितों की रक्षा की जाएगी; लेकिन यह बता ही नहीं रहे कि कैसे करेंगे रक्षा? एफडीआरआई बिल में बैंक की हालत के पतली होने की हालत में जिन लोगों की रकम सुरक्षित रखी जाएगी, उनकी लिस्ट बनी है। इस लिस्ट में बैंकों में जिनकी रकम का बीमा नहीं होता, वो पांचवे नंबर पर हैं। सरकार का दावा है कि उनकी रकम खत्म तो नहीं होगी, मगर उनकी रकम को इक्विटी में बदल दिया जाएगा।

कुल मिलाकर ऐसा माना जा रहा है कि बैंक जब नाजुक हालत में होंगे तब इस बिल के तहत वो हमारे जमा पैसे से अपना सारा घाटा पूरा कर लेंगे। और फिर इसी बिल से एक सुरंग और निकल रही है। ये सुरंग सार्वजनिक क्षेत्र के सारे बैंकों के प्राइवेट बाजार में निकल रही है। वैसे हमारी जिस रकम को इक्विटी में बदलकर बचाने का दावा सरकार कर रही है, वो दावा भी तकरीबन खोखला ही है।

जब बैंकों की हालत खराब होगी और हमारी जमा को इक्विटी में बदला जाएगा, तब इक्विटी की भी वैल्यू अपने आप कम हो जाएगी। इसलिए बैंकों में जितना पैसा हमारा जमा होगा, उसकी भी वैल्यू कम हो जाएगी। यानि घाटा होना तय है। इसके अलावा हमें अगर अपना पैसा चाहिए होगा तो इस इक्विटी को निजी कंपनियों को बेचना ही पड़ेगा। और अगर बैंक अपनी इक्विटी निजी कंपनियों को बेचते हैं तो जानते हैं क्या होगा? फिर बैंकों की मालिक निजी कंपनियां होंगी। फिर सारे बैंक प्राइवेट होंगे। यानि कि इस बिल में चाहे कोई सरकारी टीम काम करे या प्राइवेट, होना यही है कि बैंक निजी कंपनियों के हाथ कौड़ियों के मोल बिकने हैं। और इस काम के लिए संसद से भी न तो पूछा जाएगा और न ही बताया जाएगा। सीधे कार्यपालिका ही बैंकों को बेभाव लुटा सकेगी।
Story- Pro. Prabhat Patnayak
जारी

पार्ट- 1-