Sunday, August 30, 2009

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी देता हूँ....

कई साल पहले अपने नेताजी कह गए थे कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा। नेताजी तो निकल लिए (नेताजी निकले कि नही निकले, ये अभी भी बहस का विषय है...) तो हम कह रहे थे कि नेताजी तो निकल लिए, लेकिन उनके दिखाए रास्ते पे चलने वाले लोग आज भी बहुत हैं, बहुतायत मे हैं। कम से कम बनारस से लेकर अपने जयपुर और पंजाब के दो चार हजार किलोमीटर तक तो फैले ही हुए हैं। ये खून देते हैं और उसके बदले मे आजादी लेते भी हैं और देते भी हैं। कैसे? अभी परसों की ही बात है। गाजियाबाद मे एक नेताजी का दीवाना मिल गया। बेचारे को एड्स था लेकिन दोस्त की जान जा रही थी। दे दिया अपना खून। और खून के साथ आजादी भी। उसके पहले लखनऊ मे भी नेताजी के कई दीवाने पकड़े गए। खून के बदले मे आजादी बेचते हुए। उससे पहले बनारस मे पकड़े गए और अब जयपुर मे पकड़े गए हैं। बेचारे नेताजी अगर होते या फ़िर अगर कही हैं, तो अपना माथा पीट लेते। सोचते, इसीलिए उन्होंने खून और आजादी का नारा दिया था? अरे नारे का मतलब तो कुछ दूसरा ही था। वो तो अंग्रेजों से ले ली जाने वाली आजादी की बात कर रहे थे, उसी जोश मे आकर उन्होंने ये नारा दिया, और अब इस नारे का क्या हाल हो रहा है। दूसरों को जिंदगी देने वाले डाक्टर भी इसी मे शामिल हो गए हैं। कम्पाउन्डंर भी शामिल हो गए हैं। जिस तरह से खून का ये व्यापार पूरे देश मे फ़ैल रहा है या फ़िर फैला हुआ है, उससे साफ़ नजर आता है कि दूसरों को आजादी देने वाले इन दीवानों के आगे तो अंग्रेज सरकार भी शरमा जाय। खून लेना हो या खून देना हो, दोनों मे बराबर का गोरखधंधा चल रहा है। खून देने वाले भी आजादी पा जाते हैं और खून लेने वाले तो परमानेंट आजादी पा जाते हैं। अपनी पूरी जिंदगी से ही। वैसे आजाद देश मे खूब आजादी बिक रही है, बाँट रही है....कोई रोकने वाला है इस पराधीन आजादी पाने से, लेने से , देने से ?

नोट- ग्रुप फोटो हिंदू सी ली गई है, दक्षिण भारत मे खून बेचने वाला रैकेट पकड़ा गया था....

Wednesday, August 26, 2009

डायरी के तीन पन्ने

सन १९९६
स्थान- फैजाबाद
दोपहर को जब सरस्वती लाइब्रेरी से विज्ञान दीपक लेकर आया तो उसमे छापी कहानी पढ़ी। कहानी मे सन २००० की कल्पना की गई थी। मजमून कुछ यूँ था... सन २००० मे रेल और सड़क यात्रा की जरूरत नही होगी। सब लोगो के पास कार होगी जो हवा मे उडेगी। (वैसे कई जगह पढ़ा तो है की पहले की विज्ञान कहानियाँ सच होती जा रही हैं। हवा मे उड़ने की कल्पना ही तो थी, उड़ने तो लगे !!!) काश की ऐसा दिन आता और मेरे पास भी एक कार होती और मैंने उससे हवा मे उड़ता होता। तब तो मैं किसी के भी घर जा सकता हूँ....

सन २०००
स्थान- मिल्कीपुर, फैजाबाद
हम्म... दुकान तो ठीक चल रही है लेकिन गाव वाले पेड़ ही नही लगा रहे हैं.... फ्री मे दे रहे हैं तो भी नही लेकर जा रहे हैं....वैसे क्या जिन्दगी भर इस मिल्कीपुर मे दुकानदारी करनी है? यही मिल्कीपुर बचा हुआ है पेड़ लगवाने के लिए? एक से बढ़कर एक तो बदमाश हैं यहाँ.....ससुरे फ्री मे फोग्गिंग मशीन ले जाते हैं और चार चार दिन तक नही लौटाते। और एक तो ये पंडित साला, पूरे गाव मे क्वेरी के रूप मे बदनाम हो गया है....गाव भर हमको ताना दे रहा है कि तुम ही हो जो उसके खेत मे बैंगन और मिर्चा लगवाए। मौसी बता रही थी की धुनकारी को तो पिछले साल पच्छु टोला वालों ने बिजली का करंट लगाकर मार डाला था.... पता नही क्या होगा....

सन २००९
स्थान- दिल्ली मे किसी जगह पर
सावधान...कुछ भी लिख देने से पहले सावधान। आगे पीछे सोच लो। ये कोई सच का सामना नही है। कसम से, अब कुछ लिख क्यों नही सकता हूँ? उड़ क्यों नही सकता हूँ....

Tuesday, August 25, 2009

फुर्र फुर्र

http://www.henryjacksonsociety.org/henryjacksonsociety/hjsuserfiles/image/bjp.jpg
फुर्र फुर्र फुर्र फुर्र करके उडाय रहे हैं
सर्र सर्र सर्र सर्र करके सब जाय रहे हैं
कटी पतंग सब लूट रहे हैं
फट से ले के लग्गी बझाय रहे हैं
ये फांसा वो फांसा चिल्लाय रहे हैं
की बोर्ड पे जिन्ना नचाय रहे हैं
पटेल की पतंग भी घुमाय रहे हैं
सोच सोच के निकाल रहे हैं
सोचे की मंझा तेज है ,
अब किट कीताय रहे हैं
बगैर सोचे भी दाव
लगाय रहे हैं
नया पटेल भी बनाय रहे हैं
दिल्ली के दंगा माँ हेराय रहे हैं
सब के सब पतंग उडा़य रहे हैं...

Sunday, August 23, 2009

कैसे कैसे लोग.....

दुनिया भर की कलाबाजियों से अघाये, नहाये लोगों को सिर्फ़ नाक मे ऊँगली डालकर सबसे ज्यादा मजा आता है दूसरों की खबरों मे। रस ले लेकर उसे नाक से निकले रस मे डुबोकर रसहीन बनने मे रस आता है उनको। कौन क्या कर रहा है और करने से पहले उन्हें ख़ुद को जानने की आदमी इच्छा मे ही डूबकर मर जाने की उनकी चाहत न जाने कम होगी। कम होगी भी या नही, ये तो उनका मन जानता है, या फ़िर उन्हें इंतज़ार है किसी ऐसे क्षण का, जिसमे सारे रस एक मे ही डूबकर आपस मे मिल जायें। सड़क पर चलते हुए उसी सड़क पर बार बार शीशे मे अक्स निहारती वो पागल लड़की नही दिखाई देगी उनको, उसके धूल और मिटटी से सने बालों से कोई परेशानी नही होगी उनकी, और तो और अपने कोयला हो चुके और आदमजात रंग पे भी बोलने वालों से कोई परेशानी नही होगी उनको, अगर होगी तो सिर्फ़ इससे की वो क्यों है, सवाल उसके होने पे है, उसके न होने से उनके सारे सवाल भी मरने लगते हैं। इन अघाए लोगों का कोई इलाज है क्या?

Saturday, August 22, 2009

खुश होने के बहाने....

खुशी भी कई तरह की होती है। हँसी भी कई तरह की होती है। बीड़ी जलाकर चार गाल बतियाते रिक्शे वालों मे जो ठहाका लगता है, उसे हँसी कहें या खुशी, आसानी से समझ नही आता। जरूरी नही की खुशी का सीधा सम्बन्ध सुख से ही हो। सुखी लोग भी अक्सर दुखी रहते हैं। अब घर के बगल वाली आंटी को ही ले लीजिये। छोटे बेटे की जब तक शादी नही हुई थी, तब तक उसकी शादी के लिए दुखी, शादी हो गई और बहु घर आने के दूसरे महीने मे ही गर्भवती हो गई तो अब उसका दुःख। लेकिन मोहल्लेवाले मानते हैं की आंटी खुश रहती हैं। लेकिन कहाँ? जब वो दुकान पर बैठती हैं, मोहल्ले के चार लोग उनसे नमस्ते करते हैं और खासकर तब, जब उनसे उनकी बहू का हालचाल पूछ लिया जाय। खुश होते हुए भी वह अपनी दुःख भरी आपबीती सुनती हैं। लेकिन उनके खुश रहने का यही तरीका है। रोज सुबह दिल्ली और एन सी आर की तरफ़ आस पास के तीस कोस से हजारो मजदूर काम करने आते हैं। उनकी कमाई का बस एक ही जरिया होता है कि जिस दिन वो आयें, उस दिन उन्हें दिन भर का कोई काम मिल जाए। ताकि शाम को उनके घर का चूल्हा जल सके। लेकिन मजाल है की उनके चेहरों से दुःख की एक बूँद भी टपक जाए। ट्रेन मे बैठे हैं तो ताश की बाजी पे ठहाका लग रहा है और काम की तलाश मे चौराहे पे खड़े हैं तो बीडी के धुएँ मे ठहाके लगाते उनके पीले दांत उनकी खुशी को साफ़ साफ़ टपकाते जाते हैं। इस तरह से देखा जाए तो सभी खुश हैं। तो फ़िर दुःख क्या है और पूरी दुनिया खुशी की तलाश मे इधर से उधर क्यों भाग रही है। आख़िर लोग किस सच्ची खुशी की बात करते हैं? किस खुशी को खोजने पहाडों पे चले जाते हैं या एकांतवास धारण कर लेते हैं। इधर उधर बिखरी पड़ी हँसी को समेट जाए तो खुशी का भरा पूरा जिन्न बन जाता है। चिराग रगड़ा और खुशी का जिन्न बाहर। लो, हंस लो अब, हो लो खुश जितना भी हो। दरअसल जिस स्पीड से हम आगे बढ़ने और अर्थ पर डिपेंड होने के दौड़ लगा रहे हैं, आस पास की चीजों को भूलते जा रहे हैं। मेरठ मे मेरे एक दोस्त हैं। आजकल वो सामाजिक होने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक होने के लिए क्लास अटैंड कर रहे हैं। उस क्लास मे सामाजिकता मे खुश कैसे रहें, ये सिखाया जाता है। उनका कहना है की हम दुखी सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि हम सामाजिकता भूल चुके हैं, हमने प्राचीन काल से जो समाज बनाया था, उसके जो नॉर्म्स बनाये थे, अब ख़ुद ही उसे तोड़ रहे हैं। इस टूटन मे हम किस हद तक टूट चुके हैं और टूटे जा रहे हैं, ये हम अभी तो नही जान पाएंगे, लेकिन हमारे अकेले पड़ गए बच्चों के चेहरों पर इसकी टूटन साफ़ देखी जा सकती है। इसलिए खुशी की तलाश बहुत जरूरी है। लेकिन बात फ़िर से वही पर आकर अटक जाती है। खुशी की तलाश आख़िर क्यों? हम यूँ ही क्यों नही खुश रह सकते?